बड़ी खबर: 1256 हत्याओं और 13 बलात्कारों का आरोपी नेता सुप्रीम कोर्ट से बरी

बड़ी खबर: 1256 हत्याओं और 13 बलात्कारों का आरोपी नेता सुप्रीम कोर्ट से बरी

ढाका, 27 मई 2025 — बांग्लादेश में न्यायपालिका के हालिया फैसले ने देश और अंतरराष्ट्रीय समुदाय में हलचल मचा दी है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान 1256 नागरिकों की हत्या13 महिलाओं से बलात्कार, और 17 लोगों के अपहरण जैसे गंभीर आरोपों में दोषी पाए गए जमात-ए-इस्लामी के वरिष्ठ नेता एटीएम अजहरुल इस्लाम को बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया है।

13 वर्षों से जेल में था अजहरुल

अगस्त 2012 में अजहरुल को ढाका के मोघबाजार स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया था। दिसंबर 2014 में अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (ICT) ने उन्हें मानवता के खिलाफ अपराधों में दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई थी। वे पिछले 13 सालों से जेल में बंद थे।

सुप्रीम कोर्ट ने पलटा ICT का फैसला

मामले में पहले भी कई बार सुनवाई हुई थी। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को बरकरार रखा था, लेकिन अब मुख्य न्यायाधीश सैयद रेफात अहमद की अध्यक्षता में सात जजों की पीठ ने अंतिम अपील की सुनवाई के बाद अजहरुल को बरी करने का फैसला सुनाया। कोर्ट ने जेल प्रशासन से कहा है कि यदि अन्य कोई मामला लंबित नहीं है, तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए।

क्या है मामला?

  • अजहरुल इस्लाम पर आरोप था कि उन्होंने 1971 में रंगपुर क्षेत्र में हजारों नागरिकों की हत्या, महिलाओं के साथ दुष्कर्म, अपहरण और यातनाएं दी थीं।

  • उन्हें जमात-ए-इस्लामी की छात्र शाखा ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ का शीर्ष नेता माना जाता है, जिसने पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जघन्य अपराध किए थे।

राजनीतिक पृष्ठभूमि में उलझा फैसला?

विश्लेषकों का कहना है कि यह फैसला बांग्लादेश की राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत दे सकता है। पिछले साल मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सत्ता में आते ही जमात-ए-इस्लामी और उसकी छात्र शाखा पर लगी रोक हटा दी गई थी। यह वही संगठन है, जिसने पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की चुनी हुई सरकार को सत्ता से हटाने में अहम भूमिका निभाई थी।

इस फैसले के बाद मानवाधिकार संगठनों और मुक्ति संग्राम से जुड़े परिवारों में गहरा आक्रोश है। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इसे “न्याय की हत्या” बताया है।

क्या कहते हैं जानकार?

राजनीतिक विश्लेषक इसे जमात-ए-इस्लामी को पुनर्सक्रिय करने की रणनीति मान रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी इस फैसले की समीक्षा की मांग कर सकते हैं।

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