हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, महिला पहले से विवाहित हो तो बच्चों का कानूनी पिता पहला पति ही माना जाएगा, लिव-इन संबंध से जन्मे बच्चों पर कोर्ट ने कहा….

In a major ruling, the High Court has decided that if a woman is already married, the legal father of her children will be considered her first husband. The court also commented on children born from live-in relationships...

Highcourt News : हाईकोर्ट ने परिवारिक रिश्तों को लेकर एक बड़ा अहम फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने खुद को दूसरी बीबी बताने वाली महिला और उसकी बेटी की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें एक महिला और उसकी दो बेटियों ने शहर के प्रतिष्ठित नागरिक को पिता और पति घोषित करने की मांग की थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानूनी रूप से अवैध रिश्ते को वैध नहीं ठहराया जा सकता।

अगर किसी महिला की पहली शादी कानूनी रूप से अस्तित्व में है, तो उस दौरान पैदा हुए बच्चों को केवल उसके कानूनी पति की संतान माना जाएगा।चाहे कोई अन्य पुरुष उन बच्चों को अपनी संतान स्वीकार करे या महिला के साथ लिव-इन में रहे, बच्चों की वैधता कानूनन हमेशा पहले पति से ही जुड़ी रहेगी।

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कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि यदि कोई महिला पहले से वैध विवाह में है, तो उस विवाह के दौरान जन्मे बच्चों की कानूनी पहचान उसी पहले पति से जुड़ी मानी जाएगी।

भले ही बच्चे किसी अन्य पुरुष से जन्मे हों, वह पुरुष उन्हें अपनी संतान के रूप में स्वीकार करता हो या महिला के साथ लिव-इन संबंध में रह रहा हो, इससे कानून की स्थिति नहीं बदलती।यह मामला बिलासपुर का है, जहां दो महिलाओं ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर कर खुद को शहर के एक जाने-माने व्यवसायी की बेटियां बताया था।

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याचिका में कहा गया कि उनकी मां ने वर्ष 1971 में उक्त व्यवसायी के साथ माला-बदली कर विवाह किया था और उसी के बाद उनका जन्म हुआ। महिलाओं का यह भी दावा था कि उनकी मां का पहला पति वर्ष 1984 में घर छोड़कर चला गया था और उसके बाद कभी वापस नहीं लौटा।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में यह तर्क रखा कि व्यवसायी ने हमेशा उन्हें अपनी बेटियों की तरह माना और खुद भी कोर्ट में यह स्वीकार किया कि वे उसकी संतान हैं। उनका कहना था कि सामाजिक और पारिवारिक रूप से वही उनके पिता रहे हैं, इसलिए उन्हें संपत्ति में अधिकार मिलना चाहिए।

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हालांकि, फैमिली कोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि केवल किसी व्यक्ति द्वारा पितृत्व स्वीकार कर लेना, कानूनी नियमों से ऊपर नहीं हो सकता। अदालत ने यह भी देखा कि यह साबित नहीं किया जा सका कि महिला और उसके पहले पति के बीच वैवाहिक संबंध पूरी तरह समाप्त हो चुके थे।

न तो पहले पति की मृत्यु का कोई प्रमाण दिया गया और न ही यह सिद्ध हुआ कि पति-पत्नी के बीच लंबे समय से कोई संबंध नहीं था, जिसे कानून में “नॉन-एक्सेस” कहा जाता है।

फैमिली कोर्ट ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 और 11 का हवाला देते हुए कहा कि पहले विवाह के रहते किया गया दूसरा विवाह कानूनन अमान्य है। ऐसे में दूसरे पुरुष से जन्मे बच्चों को उसका कानूनी उत्तराधिकारी नहीं माना जा सकता।

इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई, लेकिन न्यायमूर्ति रजनी दुबे और न्यायमूर्ति एके प्रसाद की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि आधार कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेजों में बच्चों के पिता के रूप में पहले पति का ही नाम दर्ज है।हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह संदेश दिया कि पितृत्व और संपत्ति अधिकार जैसे मामलों में भावनात्मक तर्क या सामाजिक स्वीकार्यता नहीं, बल्कि कानून और ठोस साक्ष्य ही निर्णायक होते हैं। यह फैसला भविष्य में ऐसे ही मामलों के लिए एक स्पष्ट कानूनी दिशा तय करता है।

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