झारखंड- दारोगा की बेटी को 15 करोड़: आखिर क्या है SMA, जिस बीमारी के इलाज के लिए झारखंड सरकार ने उठाया ऐतिहासिक कदम? देश भर में हो रही तारीफ

Jharkhand—₹15 Crore for a Sub-Inspector's Daughter: What Exactly is SMA—the Disease for Which the Jharkhand Government Has Taken a Historic Step? Receiving Praise Across the Nation.

झारखंड सरकार ने एक दुर्लभ और जानलेवा बीमारी से जूझ रही बच्ची के इलाज के लिए 15 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। यह बीमारी स्पाइनल मस्क्यूलर एट्रोफी (SMA) है, जिसका इलाज दुनिया की सबसे महंगी दवा से किया जाता है।

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रांची। झारखंड से एक भावनात्मक और ऐतिहासिक फैसला सामने आया है, जहां राज्य सरकार ने एक पुलिसकर्मी की 14 माह की बेटी के इलाज के लिए करीब 15 करोड़ रुपये की मंजूरी दी है। रांची में हुई कैबिनेट बैठक में यह निर्णय लिया गया, जिससे न केवल एक परिवार को राहत मिली, बल्कि दुर्लभ बीमारियों के इलाज को लेकर सरकार की संवेदनशीलता भी सामने आई।

 

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यह मामला गिरिडीह जिले में पदस्थापित दारोगा अभिजीत कुमार की पुत्री वामिका पटेल से जुड़ा है, जो स्पाइनल मस्क्यूलर एट्रोफी (SMA) टाइप-1 जैसी गंभीर और दुर्लभ बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी के इलाज के लिए एम्स दिल्ली ने लगभग 15 करोड़ रुपये के खर्च का अनुमान दिया था, जिसे अब सरकार ने राज्यकर्मी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत स्वीकृति दे दी है।

 

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क्या है SMA (स्पाइनल मस्क्यूलर एट्रोफी)?

SMA एक आनुवांशिक (genetic) बीमारी है, जो शरीर की मांसपेशियों को नियंत्रित करने वाली मोटर न्यूरॉन कोशिकाओं को प्रभावित करती है। इस बीमारी में धीरे-धीरे मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और शरीर की गतिशीलता खत्म होती जाती है। SMA टाइप-1 इसका सबसे गंभीर रूप है, जिसमें जन्म के बाद ही बच्चों में लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसे बच्चों को सांस लेने, बैठने और चलने में गंभीर दिक्कत होती है, और बिना इलाज के उनकी जीवन अवधि अक्सर 2 साल से भी कम होती है।

 

 

 

दुनिया की सबसे महंगी दवा क्यों?

इस बीमारी के इलाज के लिए जिस दवा का उपयोग होता है, वह है जोलजेस्मा (Zolgensma), जिसे दुनिया की सबसे महंगी दवाओं में गिना जाता है। यह दवा स्विट्जरलैंड की नोवार्टिस कंपनी द्वारा बनाई जाती है और विशेष ऑर्डर पर उपलब्ध होती है।

 

जोलजेस्मा एक जीन थेरेपी आधारित दवा है, जो शरीर में खराब या काम न करने वाले SMN1 जीन को एक नए, कार्यशील जीन से बदल देती है। यह दवा एक विशेष वायरस वेक्टर के जरिए शरीर की मोटर न्यूरॉन कोशिकाओं तक पहुंचकर उन्हें नया प्रोटीन बनाने के लिए प्रेरित करती है। खास बात यह है कि यह एक बार दिया जाने वाला उपचार (single infusion) है, जो कई मामलों में बच्चों की जिंदगी बदल सकता है।

 

 

इतनी महंगी क्यों है यह दवा?

जोलजेस्मा जैसी दवाएं “प्रिसीजन मेडिसिन” की श्रेणी में आती हैं, यानी यह हर मरीज के जेनेटिक स्तर पर काम करती हैं। इसकी निर्माण प्रक्रिया बेहद जटिल, समय लेने वाली और महंगी होती है। इसके लिए उच्च गुणवत्ता वाला कच्चा माल, उन्नत तकनीक और सीमित उत्पादन क्षमता की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि इसकी कीमत करोड़ों में पहुंच जाती है।

 

सरकार का फैसला क्यों अहम?

झारखंड सरकार का यह निर्णय केवल एक बच्ची के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा संदेश भी देता है कि दुर्लभ बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को नजरअंदाज नहीं किया जाएगा। हेमंत सोरेन सरकार के इस कदम की झारखंड पुलिस एसोसिएशन ने सराहना की है और इसे मानवीय संवेदना का उदाहरण बताया है।

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