7 साल की उम्र में भारत छोड़ा… फिर रचा इतिहास! जाम्बिया सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज बनीं आभा नायर पटेल

नई दिल्ली। दिल्ली में जन्मीं एक बच्ची ने महज 7 साल की उम्र में भारत छोड़ दिया था। परिवार बेहतर भविष्य की तलाश में जाम्बिया चला गया। वक्त बदला और वही बच्ची आगे चलकर जाम्बिया की न्यायपालिका में ऐसा मुकाम हासिल कर गईं, जिसे हासिल करने वाली वह पहली महिला बनीं।

यह कहानी है जस्टिस आभा नायर पटेल की, जिन्होंने 27 मई 2026 को जाम्बिया के सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश के रूप में शपथ लेकर इतिहास रच दिया। उनकी उपलब्धियों का सिलसिला यहीं नहीं रुका। भारत के CJI सूर्यकांत के विशेष आमंत्रण पर भारत के सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पीठ पर बैठने वाली वह जाम्बिया की पहली जज भी बनीं।

7 साल की उम्र में दिल्ली से जाम्बिया पहुंचीं

आभा नायर पटेल का जन्म दिल्ली में हुआ था। वर्ष 1973 में, जब वह महज सात वर्ष की थीं, उनके माता-पिता बेहतर आजीविका की तलाश में जाम्बिया चले गए।

जाम्बिया में ही उनकी पढ़ाई आगे बढ़ी। उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ जाम्बिया से कानून की शिक्षा हासिल की और इसके बाद ब्रिटेन की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से मास्टर डिग्री प्राप्त की।

वर्ष 1989 में उन्होंने जाम्बिया बार में प्रवेश किया। इसके बाद कड़ी मेहनत, ईमानदारी और पेशेवर दक्षता के दम पर उन्होंने न्यायिक क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक का सफर

आभा नायर पटेल को वर्ष 2019 में जाम्बिया हाईकोर्ट का न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इसके बाद अप्रैल 2023 में उन्हें कोर्ट ऑफ अपील में पदोन्नति मिली।

करीब तीन साल बाद, 27 मई 2026 को उन्होंने जाम्बिया के सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। इस नियुक्ति के साथ उन्होंने देश की न्यायपालिका के इतिहास में नया अध्याय जोड़ दिया।

सिर्फ जज ही नहीं, शानदार पर्वतारोही भी

जस्टिस आभा नायर पटेल की पहचान केवल एक वरिष्ठ न्यायाधीश के तौर पर ही नहीं है। वह पर्वतारोहण में भी रुचि रखती हैं और अफ्रीका की सबसे ऊंची चोटी माउंट किलिमंजारो पर सफलतापूर्वक चढ़ाई कर चुकी हैं।

उनका यह सफर बताता है कि न्यायपालिका जैसे चुनौतीपूर्ण क्षेत्र में ऊंचाइयां हासिल करने के साथ-साथ उन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर भी मुश्किल चुनौतियों को स्वीकार किया है।

न्याय व्यवस्था के तीन मूल मंत्र बताए

भारत दौरे के दौरान सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) के कार्यक्रम में जस्टिस पटेल ने प्रभावी न्याय व्यवस्था के लिए तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर जोर दिया—इनोवेशन, इंटीग्रिटी और इंक्लूसिविटी, यानी नवाचार, सत्यनिष्ठा और समावेशिता।

उन्होंने कहा कि तकनीक या न्यायिक प्रक्रियाओं में किसी भी तरह का बदलाव तभी सार्थक है, जब उससे आम लोगों के लिए न्याय तक पहुंच आसान और निष्पक्ष बने।

भारत को लेकर अपने भावनात्मक जुड़ाव का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि भारत कभी दिल से दूर नहीं हो सकता।

AI के बढ़ते इस्तेमाल पर जताई सावधानी

जस्टिस आभा नायर पटेल ने न्यायिक प्रक्रिया में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर भी सावधानी बरतने की जरूरत बताई।

उन्होंने चिंता जताई कि अगर न्याय व्यवस्था में एल्गोरिदम पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता बढ़ती है, तो ऐतिहासिक और सामाजिक पूर्वाग्रह भी तकनीकी प्रणालियों के जरिए फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं।

CJI सूर्यकांत ने भी AI को लेकर रखी बात

कार्यक्रम में CJI सूर्यकांत ने कहा कि AI और डिजिटल तकनीक ने भारत में न्याय तक पहुंच को अधिक सरल, सुलभ और किफायती बनाने में मदद की है।

हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि AI न्यायिक प्रक्रिया में सहायता जरूर कर सकता है, लेकिन मानवीय संवेदना, न्यायिक विवेक और तर्कसंगत निर्णय का स्थान नहीं ले सकता।

दिल्ली की बेटी ने जाम्बिया में रचा इतिहास

सात साल की उम्र में भारत से जाम्बिया पहुंचीं आभा नायर पटेल ने मेहनत और लगन के दम पर न्यायपालिका में ऐसी पहचान बनाई, जिसने न सिर्फ जाम्बिया बल्कि भारत के साथ उनके रिश्ते को भी खास बना दिया।

जाम्बिया की सुप्रीम कोर्ट की पहली महिला जज बनने से लेकर भारत के सुप्रीम कोर्ट की न्यायिक पीठ पर बैठने वाली पहली जाम्बियाई जज बनने तक का उनका सफर प्रवास, संघर्ष, उपलब्धि और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता की प्रेरक कहानी बन गया है।

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