जेल की सलाखों के पीछे बदली जिंदगी! 4 साल में बंदियों ने कमाए ₹1.22 करोड़, पढ़ाई से इलाज तक ऐसे काम आई मेहनत की कमाई
Gorakhpur News: सिलाई, टेराकोटा और खेती-बागवानी से जुड़े बंदी, कमाई के साथ हुनर भी सीख रहे; रिहाई के बाद आत्मनिर्भर बनने की तैयारी

गोरखपुर: जेल की चारदीवारी के भीतर बंदियों की जिंदगी सिर्फ सजा काटने तक सीमित नहीं है। यहां उन्हें सिलाई, टेराकोटा, खेती-बागवानी और औषधीय पौधों की देखभाल जैसे कामों से जोड़ा जा रहा है। इसके साथ ही शिक्षा और कौशल विकास की गतिविधियां भी संचालित की जा रही हैं। इन कामों के बदले मिलने वाला पारिश्रमिक बंदियों की जरूरतों को पूरा करने के साथ उनके भविष्य की नई राह भी तैयार कर रहा है।
12,203 बंदियों को मिला ₹1.22 करोड़ से ज्यादा का पारिश्रमिक
कारागार प्रशासन के आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय वर्ष 2023-24 से 2026-27 में जुलाई तक कुल 12,203 बंदियों को 1 करोड़ 22 लाख 3 हजार 854 रुपये का पारिश्रमिक दिया जा चुका है। अलग-अलग वर्षों में बंदियों को मिली रकम इस प्रकार है—
- 2023-24: 3,083 बंदियों को ₹31.20 लाख
- 2024-25: 3,397 बंदियों को ₹38.27 लाख
- 2025-26: 3,473 बंदियों को ₹36.95 लाख
- 2026-27 में जुलाई तक: 1,323 बंदियों को ₹15,60,938
इस तरह चार वर्षों की अवधि में बंदियों को दी गई मेहनत की कमाई का आंकड़ा ₹1.22 करोड़ से अधिक पहुंच गया है।
सिलाई से खेती तक, कई कामों में जुटे बंदी
जेल प्रशासन ने बंदियों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार अलग-अलग गतिविधियों से जोड़ा है। कई बंदी सिलाई और टेराकोटा का काम कर रहे हैं, जबकि कुछ खेती और बागवानी में हाथ आजमा रहे हैं।
कारागार की आरोग्य वाटिका में औषधीय पौधों की देखभाल की जिम्मेदारी भी बंदियों को दी गई है। इससे उन्हें काम करने का अनुभव मिलने के साथ प्रकृति और खेती से जुड़ी गतिविधियों को समझने का अवसर भी मिल रहा है।
कमाई के साथ हुनर सीखना भी मकसद
बंदियों को श्रम से जोड़ने का उद्देश्य केवल उन्हें पारिश्रमिक देना नहीं है। इसके पीछे उन्हें कौशलयुक्त बनाकर रिहाई के बाद सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन के लिए तैयार करना भी है।
जेल में रहते हुए बंदी अलग-अलग काम सीख रहे हैं, ताकि बाहर निकलने के बाद उनके पास कोई हुनर हो और वे उसी के आधार पर रोजगार या स्वरोजगार की शुरुआत कर सकें।
पढ़ाई और कौशल विकास पर भी जोर
कारागार में बंदियों को सिर्फ काम तक सीमित नहीं रखा गया है। उन्हें शिक्षा और कौशल विकास से जुड़ी गतिविधियों में भी शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य बंदियों के व्यक्तित्व में सकारात्मक बदलाव लाना और उन्हें समाज की मुख्यधारा में दोबारा जुड़ने के लिए तैयार करना है।
यानी जेल में बिताया समय केवल सजा की अवधि न रहकर सीखने, कमाने और भविष्य संवारने का अवसर भी बन रहा है। मेहनत के बदले मिलने वाला पारिश्रमिक जहां उनकी तत्काल जरूरतों में मदद कर रहा है, वहीं सीखा गया हुनर रिहाई के बाद उनके लिए नई शुरुआत का आधार बन सकता है।












