झारखंड हाईकोर्ट फिर नाराज ….अफसरों को नोटिस जारी कर पूछा…क्यों ना आपके खिलाफ…. ये है पूरा मामला

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने अधिकारियों की कार्यशैली पर एक बार फिर नाराजगी जतायी है। चीफ जस्टिस डा रवि रंजन व जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत ने राज्य निर्वाचन सेवा के पदाधिकारियों को झारखंड प्रशासनिक सेवा में समायोजित किये जाने के मामले की सुनवाई की। इस दौरान कोर्ट ने आदेश का अनुपालन नहीं होने पर कड़ी नाराजगी जतायी। इसके बाद कोर्ट ने चीफ सिकरेट्री व कार्मिक सचिव को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। कोर्ट ने पूछा है कि क्यों ना आपके खिलाफ अवमानना का मामला चलाया जाये।

सितंबर 2021 में निर्वाचन सेवा के पदाधिकारियोंको प्रशासनिक सेवा में समायोजित करने का आदेश दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी उस आदेश को सही ठहराया था। इसके बाद भी कोर्ट के आदेश का पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने इस बात पर तीखी नाराजगी जतायी। राज्य सरकार की तरफ से शपथ पत्र दाखिल कर कहा गया कि इस मामले को कैबिनेट में ले जाया जायेगा। उससे पहले वित्त विभाग और विधि विभाग के पास भेजा जायेगा। राज्य सरकार ने इसे लेकर 12 सप्ताह का वक्त मांगा है। कोर्ट ने इसे लेकर नाराजगी जतायी।

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कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के करीब ढाई महीने बाद भी राज्य सरकार इस स्थिति में नहीं है कि वो प्रगति के बारे में कोर्ट को जानकारी दे। इस दौरान प्रार्थी के अधिवक्ता राजेश कुमार ने अदालत को बताया कि इनसे कनीय पदाधिकारियों को प्रमोशन दिये जाने की प्रक्रिया की जा रही है। उनकी तरफ से पदोन्नति पर रोक लगाने की मांग की गयी ती। इस पर आदेश ने रोक लगाने से इंकार कर दिया।

इस मामले में गायत्री कुमारी सहित अन्य ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि राज्य बनने के बाद निर्वाचन सेवा के 40 पद झारखंड के हिस्से में आये थे। उस समय केवल 12 लोग ही इस पद पर कार्यरत थे। 2008 में राज्य सरकार ने निर्वाचन सेवा को राज्य प्रशासनिक सेवा में विलय कर दिया। शर्त लगायी गयी कि वर्तमान में कार्यरत लोगों को प्रशासनिक सेवा का नहीं माना जायेगा। जब-जब पद खाली होगा, उसे प्रशासनिक सेवा का पद मानते हुए नियुक्ति की जायेगी। जब राज्य सरकार ने 40 पदों को प्रशासनिक सेवा का मान लिया है, तो इस पर कार्यरत लोगों को प्रशासनिक सेवा का अधिकारी माना जाना चाहिये। इस पद का लाभ और प्रमोशन देने की मांग की गयी थी।

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