बैंक ने नीलामी में लिए पूरे ₹30.90 लाख, फिर भी नहीं दिया फ्लैट का कब्जा… हाईकोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला

Ranchi News: झारखंड हाईकोर्ट ने बैंक ऑफ बड़ौदा की अपील खारिज करते हुए नीलामी में संपत्ति खरीदने वालों के हित में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि बैंक नीलामी में खरीदार से पूरी रकम लेने के बाद उसे संपत्ति का कब्जा नहीं देता और रकम लंबे समय तक अपने पास रखता है, तो रकम लौटाते समय बैंक को ब्याज भी देना होगा।
चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने सिंगल बेंच के 17 जून 2026 के आदेश को बरकरार रखा। सिंगल बेंच ने बैंक को 30.90 लाख रुपये की जमा राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला जमशेदपुर की रहने वाली शिप्रा शिखा से जुड़ा है। बैंक ऑफ बड़ौदा ने 14 सितंबर 2022 को जमशेदपुर स्थित दलमा एन्क्लेव के एक फ्लैट की ई-नीलामी की थी।
नीलामी में शिप्रा शिखा ने सबसे अधिक 30.90 लाख रुपये की बोली लगाई। इसके बाद उन्होंने 15 से 26 सितंबर 2022 के बीच पूरी बोली राशि बैंक में जमा कर दी।
रकम जमा करने के बाद उन्होंने बैंक से बिक्री प्रमाणपत्र और फ्लैट का कब्जा देने का अनुरोध किया, लेकिन उन्हें संपत्ति का वास्तविक कब्जा नहीं मिल सका।
13 महीने बाद मिला बिक्री प्रमाणपत्र
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट के रिकॉर्ड से सामने आया कि बिक्री प्रमाणपत्र पर 15 मार्च 2023 की तारीख थी, लेकिन यह प्रमाणपत्र शिप्रा शिखा को 27 अक्टूबर 2023 को ई-मेल के जरिए भेजा गया।
यानी ई-नीलामी के करीब 13 महीने बाद उन्हें बिक्री प्रमाणपत्र मिला। इसके बावजूद फ्लैट का वास्तविक कब्जा उन्हें नहीं दिया गया।
बैंक ने अक्टूबर 2023 में बताया था कि संपत्ति का भौतिक कब्जा लेने के लिए पूर्वी सिंहभूम के जिला दंडाधिकारी के समक्ष SARFAESI Act की धारा 14 के तहत कार्रवाई चल रही है।
आखिर क्यों मांगे पैसे वापस?
इस बीच शिप्रा शिखा ने स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों और आर्थिक जरूरत का हवाला देते हुए अपनी जमा राशि वापस मांगी।
बैंक ने 22 नवंबर 2023 को ई-नीलामी रद्द करने की सूचना दी। हालांकि, जमा की गई 30.90 लाख रुपये की राशि 6 अप्रैल 2024 को वापस की गई।
बैंक ने रकम लौटाते समय उनसे एक अंडरटेकिंग भी ली कि भविष्य में वह रद्द की गई नीलामी से संबंधित कोई दावा नहीं करेंगी।
इसके बाद शिप्रा शिखा ने बैंक से जमा रकम पर ब्याज की मांग की, लेकिन बैंक ने इसका विरोध किया।
बैंक की दलील क्यों नहीं मानी कोर्ट ने?
बैंक का कहना था कि रकम वापस करने की मांग खुद खरीदार ने की थी और उन्होंने भविष्य में कोई दावा नहीं करने की अंडरटेकिंग भी दी थी। इसलिए बैंक ब्याज देने के लिए बाध्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
खंडपीठ ने कहा कि खरीदार ने पूरी रकम जमा कर दी थी, लेकिन लंबे समय तक संपत्ति का कब्जा नहीं मिलने के बाद रकम वापस मांगी। कोर्ट ने यह भी ध्यान में रखा कि वह बीमारी और चिकित्सा संबंधी जरूरतों के कारण पैसों की तत्काल आवश्यकता में थीं।
कोर्ट के मुताबिक ऐसी परिस्थितियों में ली गई अंडरटेकिंग दबाव की स्थिति में ली गई प्रतीत होती है। दबाव, धमकी या अनुचित प्रभाव में दी गई सहमति को स्वतंत्र सहमति नहीं माना जा सकता।
बैंक को 6% ब्याज देने का आदेश बरकरार
हाईकोर्ट ने कहा कि खरीदार से पूरी नीलामी राशि लेने के बाद बैंक की जिम्मेदारी थी कि उचित समय के भीतर संपत्ति का भौतिक कब्जा उपलब्ध कराए।
जब बैंक ऐसा करने में असफल रहा और रकम लंबे समय तक अपने पास रखी, तो उसे रकम उपयुक्त ब्याज के साथ लौटानी चाहिए थी।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बैंक को 30.90 लाख रुपये की जमा राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के आदेश को बरकरार रखा और बैंक की अपील खारिज कर दी।
नीलामी में संपत्ति खरीदने वालों के लिए क्यों अहम है फैसला?
यह फैसला उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है जो बैंक की नीलामी में संपत्ति खरीदते हैं। कोर्ट ने साफ किया है कि सिर्फ पूरी रकम लेना ही बैंक की जिम्मेदारी पूरी नहीं करता। खरीदार को संपत्ति का कब्जा उपलब्ध कराना भी बैंक की जिम्मेदारी का हिस्सा है।
अगर बैंक उचित समय में कब्जा नहीं देता और बाद में नीलामी रद्द कर रकम वापस करता है, तो परिस्थितियों के आधार पर खरीदार को रकम पर ब्याज का अधिकार हो सकता है।









