न जमीन अपने नाम, न सिर पर पक्की छत… बच्चों का पेट भरने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर मां…बेबसी देख पसीज जाएगा दिल

चार दिव्यांग बच्चों का दर्द, टूटी झोपड़ी और भूख से जूझता परिवार… अब सरकार से आखिरी उम्मीद

भैरोपुर। जिस मां की गोद में बच्चों का बचपन सुरक्षित होना चाहिए, आज वही मां अपने चार दिव्यांग बच्चों का पेट भरने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाने को मजबूर है। आंखों में आंसू, चेहरे पर बेबसी और सिर पर टूटी हुई छत… यह कहानी किसी एक परिवार की मजबूरी नहीं, बल्कि उस जिंदगी की तस्वीर है जहां हर दिन एक नई चुनौती बनकर सामने खड़ा है।

नगर पंचायत नगर के वार्ड नंबर 10, भगत सिंह नगर के भैरोपुर से सामने आई इस तस्वीर ने लोगों को झकझोर दिया है। राम किशन अपने परिवार के साथ घास-फूस और पन्नी से बनी एक जर्जर झोपड़ी में रहने को मजबूर हैं। परिवार की सबसे बड़ी चिंता यह है कि उनके चारों बच्चे दिव्यांग हैं और खुद अपने लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम तक नहीं कर सकते।

ये खबर भी पढ़ें…
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

बारिश में टपकती छत, पन्नी के सहारे गुजरती रात

राम किशन का परिवार जिस झोपड़ी में रह रहा है, वहां न तो रहने की पर्याप्त सुविधा है और न ही मौसम से बचने का पुख्ता इंतजाम। बारिश के दिनों में छत से पानी टपकता है और परिवार को पन्नी के सहारे रात गुजारनी पड़ती है।

परिवार के मुताबिक राम किशन खुद भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हैं। ऐसे में चारों दिव्यांग बच्चों की देखभाल और परिवार का खर्च चलाने की पूरी जिम्मेदारी उनकी पत्नी के कंधों पर आ गई है।

ये खबर भी पढ़ें…
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

बच्चों का पेट भरने के लिए मांगनी पड़ती है मदद

मां की सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उसके बच्चे भूखे न सोएं। आर्थिक स्थिति इतनी खराब है कि कई बार बच्चों का पेट भरने के लिए उसे दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़ता है।

कभी बच्चों की भूख की चिंता तो कभी बारिश में सिर छिपाने के लिए छत की चिंता… इसी जद्दोजहद के बीच परिवार किसी तरह जिंदगी आगे बढ़ा रहा है।

ये खबर भी पढ़ें…
Plugin developed by ProSEOBlogger. Get free gpl themes.

डेढ़ लाख रुपये देने के बाद भी जमीन का दावा

परिवार की परेशानी सिर्फ गरीबी और बच्चों की दिव्यांगता तक सीमित नहीं है। राम किशन का कहना है कि जिस जमीन पर उनका आशियाना बना है, वह जमीन उनके नाम नहीं है।

राम किशन के मुताबिक उन्होंने मेहनत-मजदूरी करके जमीन के लिए करीब डेढ़ लाख रुपये दिए थे, लेकिन पैसे देने के बावजूद जमीन अब तक उनके नाम नहीं की गई। परिवार का आरोप है कि इस मामले को लेकर भी उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

सरकारी योजनाओं की आस, लेकिन हाथ लगी मायूसी

परिवार का कहना है कि दिव्यांग बच्चों के लिए मिलने वाली सरकारी सहायता, आवास और अन्य योजनाओं का लाभ लेने के लिए उन्होंने कई बार सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए। लेकिन उनके मुताबिक अब तक उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिल सकी है।

परिवार की मांग है कि बच्चों की स्थिति को देखते हुए उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, रहने के लिए पक्का और सुरक्षित घर मिले और जमीन का भी समाधान कराया जाए।

मां की एक ही गुहार—बच्चों को किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े

इस परिवार की सबसे बड़ी इच्छा कोई बड़ी दौलत नहीं है। मां बस इतना चाहती है कि उसके बच्चों को भूख मिटाने के लिए किसी दूसरे के सामने हाथ न फैलाना पड़े। उनके सिर पर एक सुरक्षित छत हो और परिवार के पास रहने के लिए अपनी जमीन हो।

आज इस परिवार की हालत कई सवाल खड़े करती है—चार दिव्यांग बच्चों की जिंदगी कब आसान होगी? जिम्मेदार अधिकारियों की नजर इस परिवार तक कब पहुंचेगी? सरकारी योजनाओं का लाभ आखिर उन लोगों तक कब पहुंचेगा, जिन्हें उसकी सबसे ज्यादा जरूरत है?

भैरोपुर से सामने आई यह तस्वीर अब सिर्फ मदद की गुहार नहीं लगा रही, बल्कि व्यवस्था से जवाब भी मांग रही है। न जमीन अपने नाम, न पक्का घर और चार दिव्यांग बच्चों की जिम्मेदारी… आखिर यह मां कब तक अपने बच्चों का पेट भरने के लिए दूसरों के सामने हाथ फैलाती रहेगी?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

close