इस साल वट सावित्री व्रत कब है… जानें व्रत कथा और पूजा विधि विस्तार से

धनबाद: वट सावित्री की पूजा सुहाग की अखंडता के लिए किया जाता है। इस पूजा को सुहागिन महिलाएं वटवृक्ष की पूजा करती हैं। हर साल ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट सावित्री का व्रत होता है। इस बार ये व्रत 30 मई को मनाया जा रहा है। इस दिन महिलाएं पति की लंबी आयु की कामना के साथ व्रत रखती हैं और वट के वृक्ष यानी कि बरगद के पेड़ की पूजा अर्चना करती हैं। खास बात है कि इस बार वट सावित्री के व्रत के दिन इस साल का पहला सूर्य ग्रहण पड़ रहा है। ऐसे में लोगों को पूजा के शुभ मुहूर्त को लेकर थोड़ा असमंजस है।

वट सावित्री पूजा का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि।
वट सावित्री व्रत वाले दिन सुहागिन महिलाएं प्रात: जल्दी उठें और स्नान करें। स्नान के बाद व्रत का संकल्प लें। शृंगार जरूर करें। साथ ही इस दिन पीला सिंदूर लगाना शुभ माना जाता है। इस दिन बरगद के पेड़ के नीचे सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति रखें। बरगद के पेड़ में जल डालकर उसमें पुष्प, अक्षत, फूल और मिठाई चढ़ाएं। सावित्री-सत्यवान और यमराज की मूर्ति रखें। बरगद के वृक्ष में जल चढ़ाएं। वृक्ष में रक्षा सूत्र बांधकर आशीर्वाद मांगें। वृक्ष की सात बार परिक्रमा करें। इसके बाद हाथ में काले चना लेकर इस व्रत का कथा सुनें। कथा सुनने के बाद पंडित जी को दान देना न भूलें। दान में आप वस्त्र, पैसे और चने दें। अगले दिन व्रत को तोड़ने से पहले बरगद के वृक्ष का कोपल खाकर उपवास समाप्त करें।
वट सावित्री व्रत वाले दिन सुकर्मा योग सुबह से लेकर रात 11 बजकर 39 मिनट तक है. इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग सुबह 07 बजकर 12 मिनट से अगले दिन 31 मई मंगलवार को सुबह 05 बजकर 24 मिनट तक है.

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वट सावित्री व्रत का महत्व :

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वट वृक्ष के नीचे बैठकर ही सावित्री ने अपने पति सत्यवान को दोबारा जीवित कर लिया था। कहा जाता है कि इसी दिन सावित्री अपने पति सत्यवान के प्राण यमराज से वापस ले आई थीं। इस व्रत में महिलाएं सावित्री के समान अपने पति की दीर्घायु की कामना तीनों देवताओं से करती हैं, ताकि उनके पति को सुख-समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त हो सके

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