झारखंड के खजाने पर बड़ा खतरा? खनिज संशोधन बिल के खिलाफ CM सोरेन ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र, हजारों करोड़ के नुकसान का दावा
हेमंत सोरेन ने धारा 9D पर जताई आपत्ति, कहा- राज्य के वित्तीय अधिकार और संघीय ढांचा प्रभावित होने का खतरा; 2026-27 में ₹13,215 करोड़ की आय का अनुमान

Ranchi News: झारखंड में खनिज संपदा से मिलने वाले राजस्व को लेकर राज्य सरकार और केंद्र के बीच टकराव के संकेत मिल रहे हैं। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखा है। 13 अगस्त को लिखे पत्र में मुख्यमंत्री ने विधेयक को झारखंड के वित्तीय अधिकारों, राज्य की स्वायत्तता और संघीय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया है।
मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति से इस मामले में हस्तक्षेप करते हुए झारखंड के संवैधानिक और वित्तीय अधिकारों की रक्षा करने की अपील की है।
राष्ट्रपति के झारखंड से जुड़ाव का किया जिक्र
हेमंत सोरेन ने पत्र की शुरुआत राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के झारखंड से पुराने जुड़ाव का उल्लेख करते हुए की। उन्होंने याद दिलाया कि द्रौपदी मुर्मू वर्ष 2015 से 2021 तक झारखंड की राज्यपाल रही हैं।
सोरेन ने कहा कि इस दौरान उन्होंने राज्य के आदिवासी क्षेत्रों, खनन प्रभावित इलाकों और वहां रहने वाले लोगों की समस्याओं को करीब से देखा है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति को आदिवासी युवाओं और संघर्षरत परिवारों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बताया।
धारा 9D पर क्यों है झारखंड सरकार को आपत्ति?
मुख्यमंत्री ने विधेयक में प्रस्तावित धारा 9D को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक, इस प्रावधान के तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज वाली जमीन पर टैक्स, सेस या किसी अन्य लेवी को केवल केंद्र सरकार की तय शर्तों और सीमाओं के भीतर ही लगा सकेंगी।
झारखंड सरकार को आशंका है कि इसका असर पहले से लगाए गए सेस और उससे जुड़े बकाया दावों पर भी पड़ सकता है। मुख्यमंत्री ने इसे राज्यों के अधिकारों और देश के संघीय ढांचे से जुड़ा गंभीर विषय बताया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का दिया हवाला
हेमंत सोरेन ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों वाली संविधान पीठ के Mineral Area Development Authority बनाम Steel Authority of India Ltd. मामले में दिए गए फैसले का भी हवाला दिया।
मुख्यमंत्री के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि 49 के तहत राज्यों के खनिज वाली जमीन पर टैक्स या सेस लगाने के अधिकार को मान्यता दी थी।
इसी फैसले के आधार पर झारखंड विधानसभा ने Jharkhand Mineral Bearing Land Cess Act, 2024 पारित किया था।
₹13,215 करोड़ की कमाई पर संकट?
मुख्यमंत्री ने पत्र में झारखंड के खनिज राजस्व से जुड़े आंकड़े भी सामने रखे हैं। उनके अनुसार, वर्ष 2024-25 में राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 फीसदी हिस्सा खनन क्षेत्र से आया।
झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से राज्य को 2024-25 में करीब ₹1,379 करोड़, जबकि 2025-26 में ₹7,488 करोड़ की प्राप्ति हुई।
मौजूदा रुझान के आधार पर 2026-27 में इस सेस से करीब ₹13,215 करोड़ की आय का अनुमान जताया गया है। यही वजह है कि राज्य सरकार इसे केवल अतिरिक्त राजस्व का स्रोत नहीं, बल्कि राज्य की आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बता रही है।
‘सेस का मकसद सिर्फ पैसा जुटाना नहीं’
हेमंत सोरेन ने कहा कि मिनरल बेयरिंग लैंड सेस का उद्देश्य सिर्फ सरकारी खजाना भरना नहीं है। इसका इस्तेमाल खनन प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं के विकास के लिए किया जा सकता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा से होने वाली आर्थिक गतिविधियों का लाभ उन लोगों और क्षेत्रों तक भी पहुंचना चाहिए, जिन्होंने खनन के कारण विस्थापन, प्रदूषण और रोजगार के नुकसान जैसी समस्याओं का सामना किया है।
मंईयां सम्मान योजना का भी किया जिक्र
मुख्यमंत्री ने पत्र में मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि इस योजना के तहत 50 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है।
सोरेन का कहना है कि यदि राज्य के अपने राजस्व स्रोत कमजोर होते हैं तो इसका असर केवल सरकारी आय पर नहीं पड़ेगा, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं, शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और खनन प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर भी पड़ सकता है।
राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की अपील
हेमंत सोरेन ने चेतावनी दी है कि यदि संशोधन लागू होने के बाद राज्य की सेस लगाने की शक्ति सीमित या खत्म होती है, तो झारखंड को हर साल हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
मुख्यमंत्री ने पूरे मामले को झारखंड के राजस्व से आगे बढ़कर राज्यों के अधिकार, संघीय ढांचे और वित्तीय स्वायत्तता का मुद्दा बताया है। उन्होंने राष्ट्रपति से गंभीरता से विचार करने और झारखंड के संवैधानिक एवं वित्तीय अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करने की अपील की है।
अब नजर इस बात पर है कि राष्ट्रपति की ओर से इस पत्र और झारखंड सरकार की आपत्तियों पर क्या कदम उठाया जाता है।












