तीन तलाक के बाद अब ‘चार शादियों’ पर भी संकट? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब, मुस्लिम पर्सनल लॉ को लेकर छिड़ी बड़ी कानूनी बहस

Supreme Court: तीन तलाक को लेकर ऐतिहासिक फैसला आने के बाद अब मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह यानी एक से ज्यादा शादियों की व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम कानूनी लड़ाई शुरू हो गई है। शीर्ष अदालत ने मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह की अनुमति देने वाली व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। साथ ही अदालत ने केंद्र से यह भी विचार करने को कहा है कि क्या धर्म से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के लिए बहुविवाह खत्म करने के लिए कोई वैधानिक कदम उठाया जा सकता है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी बहुविवाह पर प्रतिबंध लगाने का कोई फैसला नहीं दिया है। फिलहाल अदालत के सामने सवाल यह है कि मौजूदा कानूनी व्यवस्था संविधान के समानता और लैंगिक न्याय के सिद्धांतों पर खरी उतरती है या नहीं।
आखिर मामला क्या है?
मामले में दायर याचिकाओं में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 को चुनौती दी गई है, जहां तक वह मुस्लिम पुरुषों के बहुविवाह को मान्यता देने वाली व्यक्तिगत कानून व्यवस्था से जुड़ती है।
याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि जब भारतीय न्याय संहिता यानी BNS की धारा 82 सामान्य तौर पर पहली शादी के रहते दूसरी शादी को अपराध बनाती है, तो मुस्लिम पुरुषों के लिए अलग व्यवस्था क्यों होनी चाहिए। याचिका में इस कानूनी अंतर को संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 से जोड़कर चुनौती दी गई है।
क्या अब चार शादियों पर तुरंत लग जाएगा बैन?
नहीं। अभी ऐसा कोई फैसला नहीं हुआ है।
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। इसके अलावा याचिका में बहुविवाह को सभी नागरिकों के लिए खत्म करने के लिए संसद से कानून बनाने की मांग भी की गई है। इसलिए फिलहाल यह कहना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने चार शादियों पर रोक लगा दी है या जल्द ही रोक लगने वाली है।
याचिकाकर्ताओं की सबसे बड़ी दलील क्या है?
याचिकाकर्ताओं का कहना है कि अलग-अलग समुदायों के लिए विवाह और दूसरी शादी को लेकर अलग-अलग कानूनी स्थिति समानता के अधिकार और लैंगिक न्याय के सवाल खड़े करती है।
वे चाहते हैं कि बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित किया जाए और BNS की धारा 82 को सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू किया जाए। याचिका में मुस्लिम महिलाओं को विवाह और तलाक से जुड़े मामलों में ज्यादा कानूनी सुरक्षा देने की भी मांग की गई है।
निकाह हलाला का मुद्दा भी क्यों जुड़ा है?
इस व्यापक विवाद में निकाह हलाला का मुद्दा भी लंबे समय से सुप्रीम कोर्ट के सामने रहा है। याचिकाकर्ताओं ने इसे भी संवैधानिक अधिकारों और महिलाओं की गरिमा के नजरिए से चुनौती दी है।
हालांकि, बहुविवाह और निकाह हलाला पर अभी कोई अंतिम न्यायिक फैसला नहीं आया है। इसलिए इन प्रथाओं के भविष्य को लेकर फिलहाल सिर्फ कानूनी बहस और याचिकाओं में की गई मांगों की बात की जा सकती है।
तीन तलाक मामले में क्या हुआ था?
2017 में शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संविधान पीठ ने तत्काल तीन तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक करार दिया था। इसके बाद संसद ने कानून बनाकर तत्काल तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाया।
लेकिन उस फैसले में बहुविवाह और निकाह हलाला पर अंतिम फैसला नहीं दिया गया था। यही वजह है कि इन प्रथाओं को लेकर कानूनी विवाद आगे भी जारी रहा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों में क्या कहा गया?
1995 के सरला मुद्गल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धर्म परिवर्तन के जरिए पहली शादी को खत्म किए बिना दूसरी शादी करने की कोशिश को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की थी। बाद में 2000 के लिली थॉमस बनाम भारत संघ मामले में भी अदालत ने इस कानूनी स्थिति को दोहराया।
हालांकि, इन फैसलों को सीधे तौर पर यह फैसला मानना सही नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह को पहले ही असंवैधानिक घोषित कर दिया है। मौजूदा याचिका इसी सवाल को नए संवैधानिक संदर्भ में उठाती है।
अभी मुस्लिम पुरुषों के लिए क्या कानूनी स्थिति है?
मौजूदा न्यायिक स्थिति में मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मुस्लिम पुरुष के एक से अधिक विवाह करने को सामान्य तौर पर हिंदू विवाह कानून के तहत होने वाली दूसरी शादी की तरह स्वतः द्विविवाह का अपराध नहीं माना जाता। 2026 में भी विभिन्न अदालतों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत बहुविवाह की मान्यता का उल्लेख किया है।
यानी अभी कोई नया बैन लागू नहीं हुआ है। इस मामले में आगे सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और केंद्र के जवाब के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
अब सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या है?
अब इस मामले में बहस सिर्फ ‘चार शादियों’ तक सीमित नहीं रहने वाली। अदालत के सामने बड़े संवैधानिक सवाल हैं—धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बने? क्या व्यक्तिगत कानूनों पर संवैधानिक कसौटी लागू हो सकती है? और क्या विवाह जैसे मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून होना चाहिए?
इन सवालों के जवाब आने वाले समय में भारत में पर्सनल लॉ, लैंगिक समानता और समान नागरिक संहिता से जुड़ी बहस की दिशा को भी प्रभावित कर सकते हैं।
फिलहाल सबसे अहम बात यही है कि सुप्रीम कोर्ट ने बहुविवाह पर बैन नहीं लगाया है, बल्कि केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में अदालत क्या रुख अपनाती है, इसी पर इस पूरे मामले की दिशा तय होगी।












