कहीं शिक्षक नहीं, कहीं बिजली-पंखे गायब तो कहीं पानी और शौचालय की समस्या; UDISE+ के आंकड़े सुधार की कहानी बताते हैं, लेकिन बच्चों के प्रदर्शन ने जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया
स्कूल में पढ़ने की उम्र में सड़क पर क्यों उतरे हजारों बच्चे? 10 राज्यों की तस्वीर ने खोल दी शिक्षा व्यवस्था की ऐसी पोल, जिसे जानकर आप भी पूछेंगे- आखिर बच्चों की गलती क्या है?

Education News: स्कूल में बच्चे इसलिए जाते हैं ताकि पढ़-लिखकर अपना भविष्य बना सकें, लेकिन जुलाई-अगस्त 2026 में देश के कम से कम 10 राज्यों और 25 जिलों से सामने आई तस्वीर ने शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कहीं बच्चे शिक्षक की मांग को लेकर सड़क पर उतरे, तो कहीं बिजली, पंखे, पीने का पानी, शौचालय और मिड-डे मील जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए प्रदर्शन करना पड़ा।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि बच्चों की मांगें कोई बड़ी या असाधारण सुविधा की नहीं थीं। वे सिर्फ इतना चाहते थे कि स्कूल में शिक्षक हों, पढ़ने के लिए सुरक्षित कमरा हो, पीने का साफ पानी मिले और शौचालय-पंखे जैसी जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों।
फतेहपुर से शुरू हुई आवाज, कई राज्यों तक पहुंचा विरोध
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में 28 जुलाई को कक्षा 6 से 12 तक के सैकड़ों छात्रों ने स्कूल की बदहाल व्यवस्थाओं को लेकर प्रदर्शन किया। छात्रों की शिकायत थी कि स्कूल में बिजली की समस्या है, पंखे पर्याप्त नहीं हैं, डेस्क टूटे हुए हैं और पानी व शौचालय की स्थिति भी ठीक नहीं है।
इसके बाद उत्तर प्रदेश के कई अन्य जिलों, जिनमें लखनऊ भी शामिल है, से ऐसी शिकायतें और प्रदर्शन सामने आए। यही तस्वीर मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, ओडिशा, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और पंजाब समेत कई राज्यों में भी देखने को मिली।
यानी मामला सिर्फ एक-दो स्कूलों की परेशानी तक सीमित नहीं दिख रहा।
सरकारी आंकड़े कुछ और कहते हैं, जमीन पर तस्वीर कुछ और!
शिक्षा मंत्रालय की UDISE+ 2025-26 रिपोर्ट के मुताबिक देश में स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में पिछले वर्षों की तुलना में सुधार हुआ है। राष्ट्रीय स्तर पर करीब 95 प्रतिशत स्कूलों में बिजली, 99.5 प्रतिशत में पीने का पानी, 98.5 प्रतिशत में लड़कियों के शौचालय और 97.2 प्रतिशत में लड़कों के शौचालय की सुविधा दर्ज की गई है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है।
जब राष्ट्रीय औसत इतना बेहतर है, तो फिर बच्चे स्कूल छोड़कर प्रदर्शन करने को मजबूर क्यों हो रहे हैं?
दरअसल, राष्ट्रीय औसत और अलग-अलग राज्यों की जमीनी स्थिति में काफी अंतर है।
बिजली के आंकड़े में ही दिख जाता है बड़ा फर्क
UDISE+ के आंकड़ों के अनुसार बिजली की उपलब्धता के मामले में राष्ट्रीय औसत के मुकाबले कई बड़े राज्यों की स्थिति पीछे है।
उत्तर प्रदेश में करीब 88.8 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 90.7 प्रतिशत और राजस्थान में 91.5 प्रतिशत स्कूलों में बिजली की सुविधा दर्ज की गई। वहीं तमिलनाडु में यह आंकड़ा करीब 100 प्रतिशत, केरल में 99.8 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 99.7 प्रतिशत तक पहुंचता है।
यानी एक तरफ कुछ राज्य लगभग शत-प्रतिशत कवरेज के करीब हैं, तो दूसरी तरफ कुछ राज्यों में अब भी बड़ी संख्या में स्कूल बिजली जैसी बुनियादी सुविधा से जूझ रहे हैं।
बिहार में बच्चे 4 किलोमीटर पैदल पहुंचे SDM कार्यालय
बिहार के गया में 28 जुलाई को करीब 50 छात्रों ने अपनी समस्याओं को लेकर लगभग 4 किलोमीटर पैदल मार्च किया और टिकारी SDM कार्यालय पहुंचे।
छात्रों की शिकायतों में खराब मिड-डे मील, पीने का पानी, शौचालय, बिजली, पंखे, यूनिफॉर्म और पढ़ाई की गुणवत्ता जैसे मुद्दे शामिल थे।
सोचिए, जिन बच्चों को स्कूल में बैठकर पढ़ाई करनी चाहिए, वे अपनी बुनियादी जरूरतों की शिकायत लेकर सरकारी कार्यालय तक पैदल जाने को मजबूर हो जाएं, तो सवाल उठना लाजिमी है।
कहीं 150 बच्चों पर सिर्फ एक शिक्षक!
सिर्फ भवन और सुविधाओं की समस्या नहीं है। कई जगहों पर शिक्षकों की भारी कमी भी बच्चों के भविष्य पर असर डाल रही है।
महाराष्ट्र के बीड जिले के पारली में सैकड़ों छात्रों ने कक्षाओं का बहिष्कार कर शिक्षकों की नियुक्ति की मांग की। छात्रों का कहना था कि कई शिक्षकों के तबादले के बाद उनकी जगह नए शिक्षक नहीं आए।
धाराशिव में कक्षा 10 के छात्रों ने गणित और विज्ञान के शिक्षक नियुक्त करने की मांग को लेकर धरना दिया। छात्रों का दावा था कि इन विषयों के शिक्षकों की कमी लंबे समय से बनी हुई है।
राजस्थान के जालोर में भी छात्रों ने शिक्षक की कमी को लेकर प्रदर्शन किया। यहां एक शिक्षक पर करीब 150 छात्रों की जिम्मेदारी होने की बात सामने आई।
एक लाख से ज्यादा स्कूल अब भी सिंगल-टीचर
UDISE+ 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक देश में अभी भी 1,00,843 सिंगल-टीचर स्कूल हैं।
हालांकि पिछले साल के मुकाबले यह संख्या कम हुई है। 2024-25 में ऐसे स्कूलों की संख्या 1,04,125 थी। इसके बावजूद एक लाख से अधिक स्कूलों में सिर्फ एक शिक्षक होना अपने आप में बड़ी चुनौती है।
वहीं देश में कुल शिक्षकों की संख्या बढ़कर करीब 1.027 करोड़ हो गई है और छात्र-शिक्षक अनुपात में भी सुधार दर्ज किया गया है।
खाना, पानी और हॉस्टल को लेकर भी बच्चों का गुस्सा
कई राज्यों के आवासीय और सरकारी स्कूलों में छात्रों ने भोजन, हॉस्टल, बिजली, पानी और सफाई को लेकर भी विरोध किया।
मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश से ऐसी शिकायतें सामने आईं। धार के माता शबरी कन्या शिक्षा परिसर में 18 अगस्त को छात्राओं ने हॉस्टल और भोजन से जुड़ी समस्याओं को लेकर प्रदर्शन किया।
अमेठी और लखनऊ में भी छात्रों की ओर से भोजन, बिजली, पानी, सफाई और शिक्षकों की कमी जैसे मुद्दे उठाए गए।
कहीं स्कूल की छत गिरी, कहीं रास्ता ही बना परेशानी
राजस्थान के अलवर के जौधावास में 13 अगस्त को 174 छात्रों ने प्रदर्शन किया। वजह थी स्कूल की छत का एक हिस्सा गिरना।
मध्य प्रदेश के सिरोंज में छात्रों ने बढ़े हुए बस किराये को लेकर विरोध किया। उज्जैन में छात्राओं ने स्कूल को दूसरी जगह शिफ्ट करने का विरोध किया, क्योंकि नई जगह करीब 6 से 10 किलोमीटर दूर थी।
उत्तर प्रदेश के हमीरपुर और छत्तीसगढ़ के धमतरी में खराब सड़कों के कारण स्कूल तक पहुंचने में होने वाली परेशानी का मुद्दा भी सामने आया।
यानी सवाल सिर्फ स्कूल के अंदर की सुविधाओं का नहीं है। बच्चे स्कूल तक सुरक्षित पहुंच सकें और वहां सुरक्षित माहौल में पढ़ सकें, यह भी शिक्षा व्यवस्था की जिम्मेदारी है।
RTE Act में पहले से दर्ज हैं बच्चों के कई अधिकार
दिलचस्प बात यह है कि बच्चों की ओर से उठाई जा रही कई मांगें पहले से ही शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून के तहत निर्धारित मानकों से जुड़ी हैं।
सुरक्षित स्कूल भवन, अलग शौचालय, पीने का पानी, कक्षाएं और शिक्षण से जुड़ी जरूरी सुविधाएं बच्चों की शिक्षा के बुनियादी हिस्से हैं।
ऐसे में सवाल यह नहीं है कि बच्चों को ये सुविधाएं मिलनी चाहिए या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि कागज पर दर्ज अधिकार स्कूल की जमीन पर कितने प्रभावी तरीके से लागू हो रहे हैं?
हर तस्वीर खराब नहीं, कई क्षेत्रों में हुआ सुधार
यह कहना भी सही नहीं होगा कि देश की शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार नहीं हुआ है।
UDISE+ 2025-26 के अनुसार बिजली की सुविधा 2024-25 के 93.6 प्रतिशत से बढ़कर 95 प्रतिशत हुई। कंप्यूटर की सुविधा 64.7 प्रतिशत से बढ़कर 69.9 प्रतिशत और इंटरनेट की सुविधा 63.5 प्रतिशत से बढ़कर 67.4 प्रतिशत हुई।
लड़कियों के शौचालय की उपलब्धता भी 97.3 प्रतिशत से बढ़कर 98.5 प्रतिशत हुई।
लेकिन कुछ क्षेत्रों में अभी भी बड़ी कमी है। उदाहरण के लिए रैंप और हैंडरेल की सुविधा करीब 58.2 प्रतिशत स्कूलों में ही दर्ज की गई है। खेल के मैदान की उपलब्धता भी 83 प्रतिशत से घटकर 81.9 प्रतिशत रही।
तो आखिर बच्चे सड़क पर क्यों उतर रहे हैं?
इन घटनाओं को एक साथ देखें तो तस्वीर साफ होती है। देश में शिक्षा के बुनियादी ढांचे में सुधार जरूर हो रहा है, लेकिन सभी राज्यों और सभी स्कूलों में इसकी रफ्तार एक जैसी नहीं है।
कहीं स्कूल में शिक्षक नहीं हैं, कहीं बिजली-पानी की समस्या है, कहीं शौचालय खराब हैं तो कहीं स्कूल की इमारत ही सुरक्षित नहीं है। कई जगह बच्चों को स्कूल तक पहुंचने के लिए खराब सड़कों और महंगे परिवहन से जूझना पड़ रहा है।
इसलिए इन प्रदर्शनों को सिर्फ स्थानीय विवाद मानकर नजरअंदाज करना शायद सही नहीं होगा।
बच्चों का सड़क पर उतरना दरअसल उस अंतर की ओर इशारा है, जो सरकारी आंकड़ों में दर्ज ‘सुविधा’ और स्कूल में बच्चे को वास्तव में मिलने वाली सुविधा के बीच मौजूद है। सवाल अब यही है—जब ये चीजें बच्चों का अधिकार हैं, तो उन्हें अपना हक मांगने के लिए सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है?












