Jharkhand High Court का बड़ा आदेश, कर्मचारी की रिटायरमेंट तक का पूरा भुगतान का दिया आदेश, कहा, ‘जांच सही हो तो भी सजा न्यायसंगत होनी चाहिए’

Jharkhand High Court issues major order, orders full payment to employee until retirement, says, 'Even if the investigation is correct, the punishment must be just.'

झारखंड हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि विभागीय जांच वैध होने के बावजूद लेबर कोर्ट यह परख सकता है कि कर्मचारी को दी गई सजा उसके आरोप के अनुपात में है या नहीं। 1983 से जुड़े एक मामले में कोर्ट ने प्रबंधन की याचिका खारिज करते हुए मृत कर्मचारी के परिजनों को बकाया वेतन देने का आदेश दिया।

श्रमिक अधिकारों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए Jharkhand High Court ने स्पष्ट किया है कि न्याय केवल प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि सजा की न्यायसंगतता भी उतनी ही जरूरी है। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की एकलपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यदि विभागीय जांच नियमों के अनुरूप भी हो, तब भी लेबर कोर्ट या औद्योगिक न्यायाधिकरण को यह अधिकार है कि वह दी गई सजा की कठोरता और उसकी उपयुक्तता की समीक्षा करे।

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यह मामला वर्ष 1983 से जुड़ा है। कंपनी के कर्मचारी सी.के. सिंह का उनके ही संस्थान द्वारा संचालित अस्पताल में ऑपरेशन हुआ था। आरोप है कि ऑपरेशन के दौरान एक टांका उनके शरीर के अंदर रह गया, जिससे उन्हें संक्रमण और असहनीय पीड़ा का सामना करना पड़ा। जब वे दोबारा उपचार के लिए पहुंचे, तो कथित रूप से डॉक्टर ने इलाज करने से इनकार कर दिया।

दर्द और निराशा के बीच कर्मचारी ने विरोध जताया, जिसे प्रबंधन ने अनुशासनहीनता और अभद्र व्यवहार मानते हुए 18 जून 1984 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया। बाद में यह विवाद लेबर कोर्ट पहुंचा, जहां वर्ष 2008 में कर्मचारी के पक्ष में आदेश पारित किया गया। प्रबंधन ने इसी आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी।

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सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को केवल कानूनी दायरे में नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा। कोर्ट ने कहा कि तीव्र दर्द झेल रहे व्यक्ति की भावनात्मक प्रतिक्रिया को पूरी तरह अनुशासनहीनता नहीं माना जा सकता, विशेषकर तब जब उसे इलाज से वंचित किया गया हो।

अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि यदि ऐसी स्थिति किसी उच्च पदस्थ अधिकारी के साथ हुई होती, तो संभवतः चिकित्सकीय लापरवाही पर कार्रवाई और मुआवजा दिया जाता।

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हाई कोर्ट ने Industrial Disputes Act, 1947 की धारा 11A का उल्लेख करते हुए कहा कि लेबर कोर्ट को यह अधिकार है कि वह सजा की अनुपातिकता और कर्मचारी के पूर्व सेवा रिकॉर्ड का मूल्यांकन करे। इस मामले में कर्मचारी का 14 वर्षों का बेदाग सेवा रिकॉर्ड था, जिसे नजरअंदाज किया गया था।

सुनवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि सी.के. सिंह का निधन हो चुका है। ऐसे में कोर्ट ने मानवीय आधार पर आदेश दिया कि उनके कानूनी उत्तराधिकारियों को लेबर कोर्ट के अवार्ड की तिथि से लेकर उनकी मृत्यु या सेवानिवृत्ति तक का पूरा वेतन भुगतान किया जाए।

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