69वें राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन में दिव्यांगजनों की राजनीतिक भागीदारी पर दिया जोर, बोले- वे सिर्फ लाभार्थी नहीं, बल्कि मतदाता, प्रतिनिधि और निर्णयकर्ता भी हैं
केपटाउन में रबीन्द्रनाथ महतो ने कही ऐसी बात, गूंज उठा लोकतंत्र का सवाल… बोले- सुगमता सुविधा नहीं, बुनियाद है

रांची। दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में आयोजित 69वें राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (CPA) सम्मेलन में झारखंड विधानसभा अध्यक्ष रबीन्द्रनाथ महतो ने दिव्यांगजनों की लोकतांत्रिक भागीदारी को लेकर महत्वपूर्ण विचार रखे। 13 से 19 सितंबर तक चल रहे इस सम्मेलन में उन्होंने संसद और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दिव्यांगजनों के लिए अधिक सुगम और समावेशी बनाने की जरूरत पर जोर दिया।
सम्मेलन के वर्कशॉप-B ‘Accessible Parliaments: Inclusion for People with Disabilities’ में संबोधित करते हुए रबीन्द्रनाथ महतो ने कहा कि दिव्यांगजन लोकतंत्र में केवल लाभार्थी या अतिथि नहीं हैं। वे नागरिक, मतदाता, प्रतिनिधि, नेता और निर्णयकर्ता भी हैं। ऐसे में लोकतांत्रिक संस्थाओं तक उनकी समान पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है।
‘सुगमता सिर्फ सुविधा नहीं, लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत’
रबीन्द्रनाथ महतो ने कहा कि जब संसद और अन्य लोकतांत्रिक संस्थाएं समाज के हर वर्ग के लिए सुलभ होती हैं, तो लोकतंत्र और मजबूत होता है। उन्होंने सुगमता को महज सुविधा के तौर पर देखने के बजाय इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी जरूरत बताया।
उन्होंने कहा कि दिव्यांगजनों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बराबर की भागीदारी देने के लिए संस्थागत और भौतिक बाधाओं को दूर करना जरूरी है।
भारत की व्यवस्थाओं का केपटाउन में किया जिक्र
अपने संबोधन में विधानसभा अध्यक्ष ने भारत में दिव्यांग नागरिकों के लिए किए जा रहे विभिन्न प्रयासों की जानकारी भी साझा की। उन्होंने यूनिक डिसएबिलिटी आईडी (UDID) व्यवस्था का उल्लेख करते हुए बताया कि इसका उद्देश्य दिव्यांगजनों की पहचान और सरकारी योजनाओं तक उनकी पहुंच को आसान बनाना है।
उन्होंने बताया कि मार्च 2026 तक देश में 1.34 करोड़ से अधिक विशिष्ट दिव्यांगता पहचान पत्र जारी किए जा चुके थे।
चुनाव में घर से मतदान से लेकर व्हीलचेयर तक की सुविधाएं
रबीन्द्रनाथ महतो ने सुगम्य भारत अभियान का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके जरिए भौतिक और संस्थागत बाधाओं को कम करने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं।
उन्होंने चुनावों में दिव्यांग मतदाताओं को दी जाने वाली सुविधाओं की भी जानकारी दी। इनमें घर से मतदान, व्हीलचेयर, परिवहन सुविधा और स्वयंसेवक सहायता जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। इसके साथ ही उन्होंने डिजिटल पहुंच को भी दिव्यांगजनों के अधिकार के रूप में महत्वपूर्ण बताया।
झारखंड के चुनाव का भी दिया उदाहरण
विधानसभा अध्यक्ष ने झारखंड में वर्ष 2024 के निर्वाचन के दौरान दिव्यांग मतदाताओं के लिए उपलब्ध कराई गई सुविधाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि जरूरतमंद दिव्यांग मतदाताओं के लिए घर से मतदान की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी। साथ ही, आवश्यकता के अनुसार मतदान केंद्र तक पहुंचाने के लिए वाहनों की व्यवस्था भी की गई थी।
उन्होंने दिव्यांग अधिकार अधिनियम, 2016 के तहत मान्य 21 प्रकार की दिव्यांगताओं के बारे में भी सम्मेलन में जानकारी साझा की।
दुनिया की बड़ी आबादी से जुड़ा मुद्दा
रबीन्द्रनाथ महतो ने कहा कि दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति दिव्यांगता के साथ जीवन जी रहा है। ऐसे में लोकतांत्रिक संस्थाओं को सभी नागरिकों के लिए सुलभ बनाना केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में भागीदारी का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब संस्थाओं तक पहुंच भी समान रूप से सुनिश्चित हो।
झारखंड से ये विधायक भी सम्मेलन में शामिल
केपटाउन में आयोजित इस सम्मेलन में झारखंड से विधायक मथुरा प्रसाद महतो और दशरथ गागराई डेलीगेट्स के रूप में शामिल हुए हैं। वहीं झारखंड के अन्य प्रतिनिधि ऑब्जर्वर के तौर पर सम्मेलन में हिस्सा ले रहे हैं।
बारबाडोस में हुआ था पिछला सम्मेलन
इससे पहले 68वां राष्ट्रमंडल संसदीय सम्मेलन 5 से 12 अक्टूबर 2025 तक बारबाडोस के ब्रिजटाउन में आयोजित हुआ था। वहां मानव-केंद्रित विकास, नीति निर्माण में लैंगिक समानता, दिव्यांगजनों और वंचित वर्गों के लिए समानता तथा समावेशी शासन जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी।
1911 में हुई थी CPA की स्थापना
राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की स्थापना 1911 में विभिन्न विधायिकाओं के बीच समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से की गई थी। समय के साथ इसका विस्तार हुआ और यह अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक एवं संसदीय मंच के रूप में विकसित हुआ। वर्तमान में इसमें 56 देशों की 180 विधायी संस्थाएं शामिल हैं।












