कैंसर के खिलाफ भारत की बड़ी जीत! विदेश में 5 करोड़ का इलाज, अब देश में लाखों मरीजों को मिलेगी नई जिंदगी
IIT मुंबई के वैज्ञानिकों की स्वदेशी CAR-T थेरेपी बनी उम्मीद की किरण, गंभीर रक्त कैंसर के मरीजों के लिए खुला नया रास्ता

नई दिल्ली। कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी के इलाज में भारत ने एक बड़ी वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा विकसित स्वदेशी CAR-T थेरेपी अब उन मरीजों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है, जिन पर पारंपरिक इलाज का असर नहीं हो रहा था। सबसे बड़ी बात यह है कि जिस उपचार पर विदेशों में 4 से 5 करोड़ रुपये तक खर्च होते हैं, वही तकनीक अब भारत में कहीं कम लागत पर उपलब्ध हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह उपलब्धि न केवल चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में भारत को नई पहचान दिलाएगी, बल्कि हजारों कैंसर मरीजों के लिए जीवनदान साबित हो सकती है।
क्या है CAR-T थेरेपी?
CAR-T यानी काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी-सेल थेरेपी एक अत्याधुनिक इम्यूनोथेरेपी तकनीक है। इसमें मरीज के शरीर से टी-सेल्स नामक प्रतिरक्षा कोशिकाएं निकाली जाती हैं और प्रयोगशाला में उन्हें आनुवंशिक रूप से इस तरह तैयार किया जाता है कि वे कैंसर कोशिकाओं को पहचानकर नष्ट कर सकें।
इसके बाद इन संशोधित कोशिकाओं को दोबारा मरीज के शरीर में डाला जाता है, जहां वे कैंसर के खिलाफ सक्रिय रूप से लड़ाई करती हैं।
किन मरीजों के लिए है कारगर?
यह थेरेपी मुख्य रूप से रक्त कैंसर, विशेषकर बी-सेल एक्यूट लिम्फोब्लास्टिक ल्यूकेमिया (B-ALL) और बी-सेल नॉन-हॉजकिन लिम्फोमा (B-NHL) के मरीजों के लिए उपयोगी साबित हुई है।
विशेष तौर पर उन मरीजों को इससे लाभ मिल रहा है जिनकी बीमारी उपचार के बाद दोबारा लौट आई हो या जिन पर कीमोथेरेपी और रेडियोथेरेपी जैसी पारंपरिक उपचार पद्धतियां प्रभावी नहीं रही हों।
विदेश में करोड़ों का खर्च, भारत में बड़ी राहत
इस परियोजना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले IIT मुंबई के प्रोफेसर और शोधकर्ता डॉ. राहुल पुरवार के अनुसार, विदेशों में CAR-T थेरेपी की लागत 4 से 5 करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। वहीं भारत में विकसित स्वदेशी तकनीक के जरिए यह उपचार लगभग 26 से 40 लाख रुपये में उपलब्ध कराया जा सकता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इससे आर्थिक रूप से कमजोर और मध्यम वर्गीय मरीजों के लिए भी उन्नत कैंसर उपचार की राह आसान होगी।
सफल परीक्षणों ने बढ़ाया भरोसा
डॉ. राहुल पुरवार के नेतृत्व में विकसित इस तकनीक पर वर्ष 2021 से कार्य शुरू हुआ था। बायोटेक्नोलॉजी विभाग और बायोरैक के सहयोग से शुरू हुई इस परियोजना के तहत टाटा मेमोरियल अस्पताल और IIT मुंबई में क्लीनिकल ट्रायल किए गए।
करीब 60 मरीजों पर हुए परीक्षणों में बेहद सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। इन मरीजों में छह बच्चे भी शामिल थे। सफल परीक्षणों के बाद इस तकनीक को व्यापक स्तर पर उपयोग के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
राष्ट्रपति कर चुकी हैं राष्ट्र को समर्पित
स्वदेशी CAR-T थेरेपी को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू राष्ट्र को समर्पित कर चुकी हैं। यह भारत की उन चुनिंदा चिकित्सा उपलब्धियों में शामिल है, जिनसे वैश्विक स्तर पर देश की वैज्ञानिक क्षमता को नई पहचान मिली है।
जालौन से हार्वर्ड तक का सफर
उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के रामपुरा क्षेत्र में जन्मे डॉ. राहुल पुरवार की सफलता की कहानी भी प्रेरणादायक है। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय से प्राप्त की और आगे चलकर जर्मनी से पीएचडी तथा अमेरिका के हार्वर्ड मेडिकल कॉलेज से फेलोशिप हासिल की।
विदेशों में बेहतर अवसर होने के बावजूद उन्होंने भारत लौटकर वैज्ञानिक अनुसंधान को आगे बढ़ाने का फैसला किया। आज उनकी मेहनत और नेतृत्व में विकसित तकनीक हजारों कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बन चुकी है।
भारत के लिए क्यों है ऐतिहासिक उपलब्धि?
CAR-T थेरेपी केवल एक नई तकनीक नहीं, बल्कि कैंसर उपचार में आत्मनिर्भर भारत की दिशा में बड़ा कदम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक देश में कैंसर उपचार की तस्वीर बदल सकती है और लाखों परिवारों को नई उम्मीद दे सकती है।









