POCSO केस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त! वैवाहिक विवाद में बच्चे के यौन शोषण के आरोप पर गिरफ्तारी से पहले होगा मनोवैज्ञानिक आकलन, जारी किए नए दिशा-निर्देश
कस्टडी विवादों में POCSO के कथित दुरुपयोग पर जताई चिंता; जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने गिरफ्तारी से पहले विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर विचार करना जरूरी बताया

नई दिल्ली: पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद और बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में POCSO कानून के कथित दुरुपयोग को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। जस्टिस जेबी पार्डीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की बेंच ने कहा कि ऐसे मामलों में, जहां आरोप बच्चे के साथ रहने वाले माता-पिता या परिवार के सदस्य पर लगाए गए हों और माता-पिता के बीच तनावपूर्ण वैवाहिक विवाद चल रहा हो, पुलिस को गिरफ्तारी से पहले अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए बनाया गया POCSO कानून बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन कस्टडी की लड़ाई में इसके कथित गलत इस्तेमाल से निर्दोष व्यक्ति और सबसे महत्वपूर्ण रूप से बच्चे को गंभीर नुकसान हो सकता है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक लंबे समय से चल रहे वैवाहिक और कस्टडी विवाद से जुड़ा था। रिपोर्ट के अनुसार, पिता को बच्ची की कस्टडी मिलने के बाद मार्च 2024 में मां ने 9 साल की बेटी के यौन शोषण का आरोप लगाते हुए पिता और उसके परिवार के खिलाफ POCSO के तहत शिकायत दर्ज कराई थी। सुप्रीम कोर्ट के सामने मामले की जांच और परिस्थितियों पर विचार किया गया।
मामले में कोर्ट ने कस्टडी विवाद और POCSO आरोपों के बीच संबंध को देखते हुए बच्चे के हित और निष्पक्ष जांच के लिए सुरक्षा उपाय तय किए।
गिरफ्तारी से पहले बच्चे का मनोवैज्ञानिक आकलन
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार, ऐसे संवेदनशील मामलों में पुलिस को गिरफ्तारी का फैसला लेने से पहले बाल मनोवैज्ञानिक या मनोचिकित्सक की मदद से बच्चे का मूल्यांकन कराना होगा।
इस प्रक्रिया में जिला बाल संरक्षण इकाई यानी DCPU की सहायता ली जा सकती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि बच्चे के आकलन के लिए उचित विशेषज्ञ की पहचान और प्रक्रिया को गंभीरता से अपनाया जाना चाहिए।
सिर्फ आरोप लगते ही रूटीन गिरफ्तारी नहीं
कोर्ट के निर्देशों का मतलब यह नहीं है कि POCSO मामलों में गिरफ्तारी पूरी तरह रोक दी गई है। बल्कि वैवाहिक या कस्टडी विवाद से जुड़े विशेष मामलों में पुलिस को गिरफ्तारी से पहले उपलब्ध सबूतों और बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर विचार करना होगा।
यानी केवल आरोप सामने आने के आधार पर रूटीन तरीके से गिरफ्तारी करने के बजाय जांच अधिकारी को उपलब्ध साक्ष्यों का समग्र मूल्यांकन करना होगा।
कोर्ट में सीधे शिकायत आने पर भी सावधानी
सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में न्यायिक स्तर पर भी सावधानी बरतने को कहा है। यदि कोई अभिभावक POCSO की धारा 33 के तहत सीधे विशेष अदालत में शिकायत लेकर जाता है, तो आरोपी को समन जारी करने और मामले का संज्ञान लेने से पहले बच्चे के मूल्यांकन के लिए बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता ली जानी चाहिए
‘जीतने के लिए केस’ वाली प्रवृत्ति पर चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि लंबे समय से चल रहे कस्टडी और वैवाहिक विवादों में कभी-कभी पक्षकार बच्चे से जुड़े गंभीर आरोपों को कानूनी लड़ाई में इस्तेमाल कर सकते हैं। कोर्ट ने ऐसे मामलों में बच्चे के सर्वोत्तम हित को प्राथमिकता देने और किसी भी आरोप की निष्पक्ष तरीके से जांच करने की जरूरत पर जोर दिया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि POCSO कानून का उद्देश्य बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है और कानून की गंभीरता को कम किए बिना उसके कथित दुरुपयोग को रोकने के लिए उचित प्रक्रिया जरूरी है।
सभी पुलिस और संबंधित अदालतों तक पहुंचेंगे दिशा-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट के इन निर्देशों का उद्देश्य ऐसे मामलों में पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना है। फैसले में यह भी निर्देश दिया गया कि आदेश की जानकारी संबंधित प्राधिकरणों और न्यायिक संस्थानों तक पहुंचाई जाए।
इस फैसले से साफ है कि POCSO कानून के तहत लगाए गए आरोपों को गंभीरता से लिया जाएगा, लेकिन वैवाहिक या कस्टडी विवाद की पृष्ठभूमि वाले मामलों में गिरफ्तारी से पहले बच्चे की सुरक्षा, मानसिक स्थिति और उपलब्ध साक्ष्यों का भी व्यवस्थित मूल्यांकन जरूरी होगा।












