वडोदरा, मोरबी और बिहार. क्यों थम नहीं रहा पुल गिरने का सिलसिला? लापरवाही और भ्रष्टाचार की कहानी!

वडोदरा: सोचिए आप एक पुल से गुजर रहे हों और अचानक जमीन खिसक जाए… जो पुल जीवन का रास्ता है, वही कब कब्रगाह बन जाए — इस देश में कोई नहीं जानता। गुजरात के वडोदरा में महिसागर नदी पर बना ‘गंभीरा ब्रिज’ अचानक गिर गया।

पुल का बीच का हिस्सा नदी में समा गया। इस हादसे में 12 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि 8 लोगों को स्थानीय ग्रामीणों ने बचा लिया। 5 गाड़ियाँ नदी में जा गिरीं और एक ट्रक अधगिरे पुल के किनारे पर लटक गया।

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40 साल पुराना पुल, पर रखरखाव ज़ीरो!

1985 में बना यह पुल वडोदरा को आणंद से जोड़ता था। बताया जा रहा है कि इस पुल का रखरखाव लंबे समय से नहीं हुआ था। ना तो कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया, ना ही इसे खतरनाक घोषित किया गया।
जिम्मेदार कौन है? प्रशासन, लोक निर्माण विभाग, या वो सिस्टम जिसमें मरम्मत की फाइलें सिर्फ धूल फांकती रहती हैं?

भ्रष्टाचार की मोटी परतें, लाशों के नीचे दबा सिस्टम

विपक्ष ने आरोप लगाया है कि पुल की मरम्मत में घोर भ्रष्टाचार हुआ है।
स्थानीय लोगों ने कहा कि कई बार प्रशासन को मरम्मत के लिए अवगत कराया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हादसे पर शोक जताया और मृतकों के परिजनों को 2 लाख व घायलों को 50 हजार रुपये की मदद की घोषणा की है।

पुल गिरने का इतिहास: मोरबी से बिहार तक

गुजरात ही नहीं, 2022 में मोरबी पुल हादसे में 135 लोगों की मौत हुई थी।
2024 में बिहार में 17 दिन में 12 पुल गिरे।
महाराष्ट्र के ठाणे में 6 साल में बना पुल 24 घंटे में ही बंद करना पड़ा क्योंकि उस पर गड्ढे बन गए थे।

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नोएडा और वाराणसी में सड़कें धंस गईं, जिससे भ्रष्ट निर्माण पर सवाल खड़े हुए।

कब जागेगा सिस्टम?

हर हादसे के बाद एक रिपोर्ट आती है, एक जांच होती है, मुआवज़ा बंटता है और फिर अगला हादसा होने तक सब शांत हो जाता है।
अगर मोरबी हादसे से सीखा गया होता, तो शायद आज 12 और लोग ज़िंदा होते।

सवाल अब यही है — भारत में पुल पहले गिरते हैं या जिम्मेदारियों की नींव?

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