लाल किले से तिरंगा फहराने का मौका इन 2 प्रधानमंत्रियों को कभी नहीं मिला! एक वजह जानकर चौंक जाएंगे
दोनों बने देश के प्रधानमंत्री, लेकिन 15 अगस्त से पहले ही खत्म हो गया कार्यकाल; एक का यूपी से था गहरा राजनीतिक रिश्ता

नई दिल्ली, 15 अगस्त 2026: स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री द्वारा तिरंगा फहराना देश की सबसे प्रतिष्ठित परंपराओं में शामिल है। 15 अगस्त को देश की नजरें लाल किले पर होती हैं, जहां प्रधानमंत्री राष्ट्र को संबोधित करते हैं।
लेकिन भारतीय राजनीति के इतिहास में दो ऐसे प्रधानमंत्री भी रहे, जिन्हें लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अवसर नहीं मिला। वजह यह नहीं थी कि उन्होंने ऐसा करने से इनकार किया, बल्कि दोनों का प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल ही 15 अगस्त तक नहीं पहुंच पाया।
इनमें एक थे गुलजारी लाल नंदा और दूसरे चौधरी चरण सिंह।
गुलजारी लाल नंदा: दो बार संभाली PM की कुर्सी, फिर भी नहीं फहरा सके तिरंगा
गुलजारी लाल नंदा देश के प्रधानमंत्री पद पर दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में रहे।
- पहली बार: 27 मई 1964 से 9 जून 1964
- दूसरी बार: 11 जनवरी 1966 से 24 जनवरी 1966
दोनों ही बार उनका कार्यकाल स्वतंत्रता दिवस के आसपास नहीं था। इसलिए उन्हें 15 अगस्त को लाल किले से तिरंगा फहराने का अवसर नहीं मिला।
नंदा ने प्रधानमंत्री पद का दायित्व उस समय संभाला था, जब देश में नेतृत्व परिवर्तन हुआ था। हालांकि दोनों कार्यकाल बेहद छोटे रहे और वे स्वतंत्रता दिवस तक प्रधानमंत्री पद पर नहीं रहे।
गुलजारी लाल नंदा का यूपी से क्या रिश्ता था?
गुलजारी लाल नंदा का जन्म 4 जुलाई 1898 को सियालकोट में हुआ था, जो अब पाकिस्तान में है। उन्होंने आगरा और इलाहाबाद में शिक्षा प्राप्त की।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में उन्होंने श्रम संबंधी विषय पर शोध किया और कानून की पढ़ाई भी की। कुछ समय तक वे वकालत से भी जुड़े रहे।
हालांकि उनकी राजनीतिक पहचान आगे चलकर बंबई और गुजरात से बनी। वे बंबई विधानसभा के सदस्य रहे और बाद में साबरकांठा, गुजरात से लोकसभा पहुंचे।
चौधरी चरण सिंह: प्रधानमंत्री बने, लेकिन 15 अगस्त नहीं देख पाए
दूसरे प्रधानमंत्री थे चौधरी चरण सिंह, जिनका प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल भी इतना छोटा रहा कि वे स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से तिरंगा नहीं फहरा सके।
चौधरी चरण सिंह 28 जुलाई 1979 से 14 जनवरी 1980 तक देश के प्रधानमंत्री रहे। यानी उनका कार्यकाल करीब 5 महीने 17 दिन का रहा।
चूंकि उनका प्रधानमंत्री कार्यकाल 15 अगस्त तक नहीं पहुंचा, इसलिए उन्हें लाल किले की प्राचीर से राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अवसर नहीं मिल सका।
चौधरी चरण सिंह का यूपी से था बेहद गहरा रिश्ता
चौधरी चरण सिंह का उत्तर प्रदेश से राजनीतिक और सामाजिक रिश्ता बेहद मजबूत था। उनका जन्म 23 दिसंबर 1902 को नूरपुर, मेरठ (उत्तर प्रदेश) में हुआ था।
उन्होंने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत उत्तर प्रदेश की राजनीति से की और प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रहे। वे 3 अप्रैल 1967 से 25 फरवरी 1968 और फिर 18 फरवरी 1970 से 1 अक्टूबर 1970 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान समुदाय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से उनका गहरा जुड़ाव था। किसानों, भूमि सुधार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दे उनकी राजनीति के प्रमुख आधार रहे।
वे बागपत लोकसभा सीट से भी कई बार सांसद रहे।
आखिर क्यों नहीं फहरा सके लाल किले से झंडा?
इस पूरे इतिहास का सबसे दिलचस्प पहलू यही है कि दोनों प्रधानमंत्री बने, लेकिन प्रधानमंत्री के तौर पर एक भी स्वतंत्रता दिवस उनके कार्यकाल में नहीं आया।
गुलजारी लाल नंदा के दोनों कार्यकाल कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में बेहद छोटे रहे, जबकि चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल जुलाई 1979 से जनवरी 1980 तक ही चला।
यही वजह है कि भारतीय प्रधानमंत्रियों के इतिहास में इन दोनों के नाम एक अनोखे रिकॉर्ड के साथ दर्ज हैं—प्रधानमंत्री बनने के बावजूद दोनों को 15 अगस्त के दिन लाल किले से तिरंगा फहराने का मौका नहीं मिला।











