JPSC Food Safety Officer Recruitment: किसी ने रेलवे तो किसी ने हरियाणा की सरकारी नौकरी छोड़ी, किसी ने PhD तक दांव पर लगाई… अब 6 अभ्यर्थियों का एक ही सवाल- ‘मेरी क्या गलती?’

Ranchi News: झारखंड में JPSC से चयनित फूड सेफ्टी ऑफिसर्स और अन्य चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द किए जाने का मामला लगातार तूल पकड़ रहा है। इस फैसले ने उन अभ्यर्थियों के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है, जिन्होंने वर्षों तक मेहनत करने के बाद सरकारी नौकरी हासिल की थी। किसी ने झारखंड में सेवा करने के लिए रेलवे की नौकरी छोड़ी, किसी ने केंद्र सरकार की नौकरी से इस्तीफा दिया तो किसी ने PhD तक छोड़ दी। कई अभ्यर्थियों के परिवार की आर्थिक उम्मीदें भी इसी नौकरी से जुड़ गई थीं।

अब नियुक्ति रद्द होने के बाद इन अभ्यर्थियों की पीड़ा एक ही सवाल में सिमट गई है- अगर भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसकी सजा उन अभ्यर्थियों को क्यों मिले, जिन्होंने ईमानदारी से परीक्षा पास की?

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इसी सवाल को लेकर चयनित अभ्यर्थी सरकार से निष्पक्ष जांच और अपने मामले पर दोबारा विचार करने की मांग कर रहे हैं।

रेलवे की नौकरी छोड़कर झारखंड आए अमित, अब टूटते दिख रहे परिवार के सपने

पलामू के डालटनगंज निवासी अमित कुमार का चयन JSSC-CGL के माध्यम से हुआ था। इसके बाद वह ग्रामीण कार्य विभाग में असिस्टेंट सेक्शन ऑफिसर (ASO) के पद पर कार्यरत थे। इससे पहले अमित वर्ष 2018 से रेलवे में नौकरी कर रहे थे और ट्रेन मैनेजर के पद पर तैनात थे।

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झारखंड में रहकर परिवार के करीब सेवा करने की इच्छा में उन्होंने रेलवे की नौकरी छोड़ दी। उनका मानना था कि अपने राज्य में रहकर वह परिवार की जिम्मेदारियों को बेहतर तरीके से निभा पाएंगे।

अमित के पिता पलामू में प्लंबर का काम करते हैं, जबकि उनके बड़े भाई पंचायत सचिव हैं। परिवार में बहन की शादी की जिम्मेदारी है और अमित का करीब दो साल का छोटा बच्चा भी है।

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अमित कहते हैं कि झारखंड की नौकरी मिलने के बाद उन्हें लगा था कि अब परिवार की जिम्मेदारियां बेहतर तरीके से निभा पाएंगे। लेकिन नियुक्ति पर संकट आने के बाद उन्हें अपने सारे सपने टूटते नजर आ रहे हैं।

उनका कहना है कि अगर नियुक्ति प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। अमित का सवाल है कि अगर जांच में वह भी दोषी पाए जाते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए, लेकिन पहले यह तो जांचा जाए कि उनकी गलती क्या है।

PhD छोड़कर बनीं फूड सेफ्टी ऑफिसर, अब आगे का रास्ता मुश्किल

गोड्डा में फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद पर तैनात रहीं गिरिडीह की वैशाली कुमारी की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं है। उन्होंने झारखंड में सेवा करने के उद्देश्य से देहरादून स्थित फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (FRI) में चल रही PhD की पढ़ाई तक छोड़ दी थी।

वैशाली के मुताबिक, फूड सेफ्टी ऑफिसर की परीक्षा और चयन प्रक्रिया में करीब तीन साल लग गए। चयन के बाद नौकरी मिलने से परिवार में खुशी और भविष्य को लेकर उम्मीद जगी थी।

मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाली वैशाली के परिवार में उनके माता-पिता और दो भाई हैं। उनका कहना है कि ऐसे परिवारों के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ नौकरी नहीं, बल्कि पूरे परिवार के भविष्य का सहारा होती है।

अब नियुक्ति रद्द होने के फैसले ने उनके परिवार की उम्मीदों को झटका दिया है। वैशाली का कहना है कि उन्होंने नौकरी के भरोसे अपनी PhD तक छोड़ दी, लेकिन अब उनके सामने आगे का रास्ता मुश्किल हो गया है।

वह सरकार से किसी विशेष रियायत की मांग नहीं कर रही हैं। उनकी मांग सिर्फ इतनी है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो और उसके बाद ही कोई फैसला लिया जाए।

CWC की नौकरी छोड़कर आईं नैना, बोलीं- ‘सबको सूली पर चढ़ाना कहां का न्याय?’

सिमडेगा की रहने वाली नैना नायक ने भी झारखंड में सेवा करने के लिए बड़ा फैसला लिया था। उनका चयन फूड सेफ्टी ऑफिसर के पद पर हुआ और पोस्टिंग धनबाद में मिली।

झारखंड में नौकरी करने की इच्छा के चलते नैना ने केंद्र सरकार के अधीन CWC की नौकरी से इस्तीफा दे दिया। लेकिन कुछ ही समय बाद नियुक्ति रद्द किए जाने के फैसले ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

नैना का कहना है कि अगर नियुक्ति प्रक्रिया में कहीं गड़बड़ी हुई है तो पहले जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई होनी चाहिए। उनका सवाल है कि जब तक किसी पर आरोप साबित नहीं होता, तब तक उसे दोषी मानकर सजा कैसे दी जा सकती है?

उन्होंने सरकार के फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर कुछ लोगों ने गलत किया है तो कार्रवाई उनके खिलाफ होनी चाहिए, लेकिन सभी चयनित अभ्यर्थियों को एक साथ दोषी मानना न्यायसंगत नहीं है।

नैना समेत अन्य चयनित फूड सेफ्टी ऑफिसर्स ने नियुक्ति रद्द किए जाने के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया है। अब उनकी नजरें न्यायालय के फैसले और सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं।

पिता का निधन, परिवार पेंशन के सहारे… सरिता की नौकरी बनी थी उम्मीद

पश्चिमी सिंहभूम की सरिता जराई के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ करियर नहीं थी, बल्कि परिवार के लिए आर्थिक सहारा बनने वाली थी।

वर्ष 2023 में भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद सरिता ने करीब दो साल तक परीक्षा की तैयारी की। कड़ी मेहनत के बाद उनका चयन हुआ और इसी साल जून में उन्हें नियुक्ति मिली। लेकिन करीब दो महीने तक काम करने के बाद ही नियुक्ति रद्द होने की खबर ने उन्हें और उनके परिवार को बड़ा झटका दिया।

सरिता के पिता का निधन हो चुका है। परिवार में उनकी मां और भाई-बहन हैं और घर की आर्थिक स्थिति मुख्य रूप से पेंशन पर निर्भर है। ऐसे में सरिता की सरकारी नौकरी परिवार के लिए बड़ी उम्मीद बनकर आई थी।

सरिता का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में अनियमितता की आशंका थी तो उसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए थी। उन्होंने पूरे मामले की CBI जांच की मांग की है।

उनका कहना है कि दो साल की मेहनत के बाद मिली नौकरी महज दो महीने में चली गई। अब परिवार के सामने फिर से आर्थिक अनिश्चितता खड़ी हो गई है।

बीमार माता-पिता के लिए हरियाणा की सरकारी नौकरी छोड़ी, झारखंड आकर फंसे डॉ. अनिकेत

पलामू निवासी डॉ. अनिकेत द्विवेदी ने भी अपने गृह राज्य में सेवा करने के लिए बड़ा त्याग किया था। उन्होंने चौधरी चरण सिंह हरियाणा एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से एग्रीकल्चर साइंस में PhD की है।

JPSC में चयन से पहले वह हरियाणा सरकार में एग्रीकल्चर डेवलपमेंट ऑफिसर के पद पर पंचकूला स्थित कृषि निदेशालय के मुख्यालय में कार्यरत थे। उनका चयन BPSC में भी हुआ था, लेकिन उन्होंने हरियाणा में सेवा जारी रखी।

घर में बीमार माता-पिता की देखभाल के लिए वह अकेले थे। तीनों बहनों की शादी हो चुकी है। इसी वजह से उन्होंने हरियाणा की सरकारी नौकरी छोड़कर झारखंड लौटने का फैसला किया।

वर्ष 2018 से वह लगातार JPSC की प्रक्रिया में शामिल होते रहे और यह उनका चौथा इंटरव्यू था। 25 फरवरी को इंटरव्यू, 19 मार्च को परिणाम और 24 जून को प्रोजेक्ट भवन में नियुक्ति पत्र मिलने के बाद उन्होंने 25 जून को सिमडेगा में योगदान दिया।

लेकिन नौकरी ज्वाइन करने के करीब दो महीने बाद ही नियुक्ति को लेकर विवाद सामने आ गया।

डॉ. अनिकेत का कहना है कि अगर चयन प्रक्रिया में भ्रष्टाचार या अनियमितता की आशंका है तो सरकार को अपनी मशीनरी के माध्यम से इसकी गहन जांच करानी चाहिए। वह अपने सभी दस्तावेज जांच एजेंसियों को उपलब्ध कराने के लिए तैयार हैं।

उनका कहना है कि जांच से साफ होना चाहिए कि ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ क्या है और चयन प्रक्रिया में वास्तव में गड़बड़ी हुई थी या नहीं।

विशाल के पिता पेट्रोल पंप पर करते हैं काम, 5 साल की मेहनत के बाद मिली नौकरी भी गई

इन सभी कहानियों के बीच विशाल की कहानी भी बेहद मार्मिक है। वर्षों की तैयारी के बाद उनका चयन नेपाल हाउस में JSA के पद पर हुआ था। नौकरी मिलने के बाद उन्होंने कई महीनों तक सेवा भी दी, लेकिन नियुक्ति रद्द होने के बाद उनका भविष्य फिर अनिश्चित हो गया है।

विशाल बेहद गरीब परिवार से आते हैं। उनके पिता पेट्रोल पंप पर काम करते हैं और उन्हें करीब 5 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता है। वहीं उनके दादा गांव में छोटी सी दुकान चलाते हैं।

विशाल ने परीक्षा की तैयारी में अपने जीवन के पांच महत्वपूर्ण साल लगा दिए। नौकरी मिलने के बाद उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां उठानी शुरू कर दी थीं। ऐसे में नियुक्ति रद्द होने से परिवार के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

विशाल का कहना है कि उन्होंने और उनके जैसे हजारों अभ्यर्थियों ने छोटे-छोटे गांवों से निकलकर पूरी मेहनत और ईमानदारी से परीक्षा दी थी। उनका सवाल है कि जब उनकी कोई गलती नहीं है तो उन्हें सजा क्यों दी जा रही है?

उनकी सरकार से भावुक अपील है कि अगर किसी ने गलत किया है तो उसे सजा दी जाए, लेकिन निर्दोष अभ्यर्थियों का भविष्य न छीना जाए।

सभी की मांग एक- निष्पक्ष जांच हो, दोषी पर कार्रवाई हो

इन छह अभ्यर्थियों की कहानियां अलग-अलग हैं, लेकिन उनकी मांग लगभग एक जैसी है। किसी ने दूसरी सरकारी नौकरी छोड़ी, किसी ने PhD छोड़ी, किसी ने वर्षों की तैयारी की और किसी के पूरे परिवार की आर्थिक उम्मीदें इस नौकरी से जुड़ गई थीं।

अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि चयन प्रक्रिया में किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष और पारदर्शी जांच होनी चाहिए। जांच में जो भी दोषी मिले, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए। लेकिन बिना व्यक्तिगत भूमिका की जांच किए सभी चयनित अभ्यर्थियों की नियुक्ति रद्द करना उनके लिए बड़ा अन्याय है।

अब कई चयनित अभ्यर्थी न्यायालय का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं। ऐसे में इस पूरे मामले में अगला कदम क्या होगा, सरकार क्या फैसला लेगी और न्यायालय से क्या राहत मिलती है—इस पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

इन अभ्यर्थियों की पूरी कहानी का दर्द एक ही सवाल में छिपा है- ‘अगर हमारी गलती नहीं थी, तो हमारी नौकरी क्यों गई?’

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