Madhushravani Vrat : मधुश्रावणी व्रत आज से शुरू, पति की लंबी उम्र के लिए महिला करेंगी पूजा, जानें इस पर्व की मुख्य बातें

व्रत त्योहार : श्रावण मास के कृष्ण पक्ष पंचमी से आरंभ होकर शुक्ल पक्ष तृतीया को संपन्न होने वाली मिथिला संस्कृति की पहचान का लोकपर्व मधुश्रावणी पूजा का आज शुक्रवार से आगाज हो गया है. पति के दीर्घ जीवन की कामना के लिए मिथिला में मनाया जाने वाला मधुश्रावणी पर्व पूरे एक पक्ष अर्थात करीब 15 दिनों तक चलता है. इस बार एक महीने का मलमास होने के कारण यह पर्व पूरे डेढ़ माह तक चलेगा. यह पर्व नाग पंचमी यानी सात जुलाई से शुरू होकर 19 अगस्त तक चलेगा. पर्व के दौरान नव विवाहिताएं माता गौरी एवं नागदेवता, सावित्री – सत्यवान, शंकर-पार्वती, राम-सीता, राधा-कृष्ण व अन्य देवी-देवताओं की कथा सुनेंगी.

44 दिनों तक नव विवाहिता करेंगी फूललोढ़ी

नव विवाहिताओं की टोली सावन की रिमझिम फुहारों के बीच गुरुवार की शाम से ही फूललोढ़ी के लिए निकल पड़ी. मधुश्रावणी में बासी फूल से पूजा का विधान है. शाम में नव विवाहिता जो फूल लोढ़कर लायेगी उन्हीं फूल से अगले दिन आदी शक्ति गौरी और नाग देवता की पूजा करेंगी. मधुश्रावणी पूजा में मैना पत्ता व पान के साथ लावा, दूध, सिंदूर, पिठार, काजल, सफेद, लाल व पीले फूल की प्रमुखता होती है. परंपरा के अनुसार नव विवाहिताएं यह पर्व अपने मायके में मनाती हैं. वहीं पर्व के दौरान ससुराल से भेजे गये वस्त्र, भोजन व पूजा सामग्री का उपयोग करती हैं.

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महत्व

मधुश्रावणी पूजन के महत्व को बताते हुए पंडित सह कथावाचक फणीभूषन पाठक ने कहा कि इस पर्व के करने से सुहागिन महिलाओं के पति की उम्र बढ़ती है. घर में सुख शांति आती है. पूजन के दौरान मैना पंचमी, मंगला गौरी, पृथ्वी जन्म, महादेव कथा, गौरी तपस्या, शिव विवाह, गंगा कथा, बिहुला कथा तथा बाल वसंत कथा सहित 14 खंडों में कथा का श्रवण किया जाता है. इस दौरान गांव समाज की बुजुर्ग महिला कथा वाचिकाओं द्वारा नवविवाहितों को समूह में बैठाकर कथा सुनाई जाती है.

मान्यता

ऐसी मान्यता है कि माता पार्वती ने सबसे पहले मधुश्रावणी व्रत रखा था और जन्म जन्मांतर तक भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करती रहीं. इस पर्व के दौरान माता पार्वती और भगवान शिव से संबंधित मधुश्रावणी की कथा सुनने की भी मान्यता है. साथ ही साथ बासी फूल, ससुराल से आई पूजन सामग्री, दूध, लावा और अन्य सामग्री के साथ नाग देवता व विषहर की भी पूजा की जाती है.

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आज भी बरकरार है परंपरा

बता दें कि सदियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी बरकरार है. इस पर्व में मिथिला संस्कृति की झलक ही नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की भी झलक देखने को मिलती है. इस पूजा में लगातार 13 दिनों तक व्रत करने वाली महिलाएं प्रतिदिन एक बार अरवा भोजन करती हैं. इसके साथ ही नाग-नागिन, हाथी, गौरी, शिव आदि की प्रतिमा बनाकर प्रतिदिन कई प्रकार के फूलों, मिठाईयों एवं फलों से पूजन करती हैं. सुबह-शाम नाग देवता को दूध लावा का भोग लगाया जाता है।

टेमी दागने की है परंपरा

बताया जाता है कि पूजा के अंतिम दिन पूजन करने वाली महिला को कठिन परीक्षा से गुजरना पड़ता है. टेमी दागने की परंपरा में नवविवाहिताओं को रूई की टेमी से हाथ एवं पांव को पान के पत्ते रखकर टेमी जलाकर दागा जाता है. पूजा के अंतिम दिन 14 छोटे बर्तनों में दही और फल मिष्ठान सजाकर पूजा की जाती है. साथ ही 14 सुहागिन महिलाओं के बीच प्रसाद का वितरण कर ससुराल पक्ष से आए हुए बुजुर्ग से आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है. उसके बाद पूजा का समापन होता है.

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