Rath yatra 2023 : भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा में शामिल होने से मिलता है 100 यज्ञों का पुण्य, जानें इसका महत्व

ओडिशा : रथयात्रा की भव्यता और शोभा की बात ही निराली है. रथयात्रा एक ऐसा पर्व है जिसमें भगवान जगन्नाथ स्वयं चलकर भक्तों के बीच आते हैं और सुख दुख के सहभागी बनते हैं. भगवान श्रीजगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद माना जाता है. जिसको ग्रहण करने के लिए सभी भक्त बेहद ललायित रहते हैं. ऐसा माना जाता है कि श्रीजगन्नाथ जी के प्रसाद को महाप्रसाद का स्वरूप महाप्रभु श्री बल्लभाचार्य जी ने दिया था.
रथयात्रा उत्सव की तैयारियां महीनों पहले से शुरू कर दी जाती हैं और रथयात्रा वाले दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और उत्सव मनाते हैं. पुरी में जिस रथ पर भगवान सवार होते हैं वह विशाल और अद्वितीय है. इसका आध्यात्मिक और पौराणिक दृष्टि से विशेष महत्व भी है. रथयात्रा उत्सव के दौरान श्रद्धालुओं का भक्ति भाव देखते ही बनता है. क्योंकि जिस रथ पर भगवान चलते हैं, उसे घोड़े या अन्य जीव नहीं, बल्कि श्रद्धालुगण ही खींच रहे होते हैं.
100 यज्ञों के बराबर है रथयात्रा का पुण्य
भगवान श्रीकृष्ण के अवतार ‘श्री जगन्नाथ’ की रथयात्रा का पुण्य 100 यज्ञों के बराबर माना जाता है. यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है. जगन्नाथ जी का रथ ‘नंदीघोष’ कहलाता है. रथ पर जो ध्वज होता है उसे ‘गरुड़ध्वज’, ‘कपिलध्वज’ या ‘त्रैलोक्यमोहिनी’ कहते हैं. बलराम जी का रथ ‘तालध्वज’ के नाम से पहचाना जाता है. रथ के ध्वज को ‘उनानी’ कहते हैं. जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है वह ‘वासुकी’ कहलाता है. भगवती सुभद्रा का रथ दर्पदलन कहलाता है. रथ पर ‘पद्मध्वज’ या ‘नदंबिक’ नाम का ध्वज लगा होता है. इसे खींचने वाली रस्सी को ‘स्वर्णचूड़ा’ कहा जाता है.










