महिलाओं के लिए बड़ी खबर: तीसरी बार मां बनने पर भी नहीं रोकी जा सकती छुट्टी, हाईकोर्ट का बड़ा आदेश
सरकारी नियमों पर भारी पड़ा अदालत का आदेश, कहा मातृत्व में भेदभाव किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं

महिलाओं के अधिकारों से जुड़े एक अहम मामले में मद्रास हाई कोर्ट का फैसला बड़ा मोड़ लेकर आया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि तीसरी गर्भावस्था के आधार पर किसी महिला को मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता। इस फैसले ने उन नियमों और सोच पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो अब तक तीसरे बच्चे के मामले में छुट्टियों को सीमित करने की कोशिश करते रहे हैं।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि मां बनने की प्रक्रिया में पहली और तीसरी गर्भावस्था के बीच कोई फर्क नहीं किया जा सकता। एक महिला को हर बार समान शारीरिक और मानसिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, ऐसे में मातृत्व लाभ में भेदभाव का कोई औचित्य नहीं है।
यह मामला शायी निशा नाम की महिला कर्मचारी की याचिका से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी तीसरी गर्भावस्था के लिए 2 फरवरी 2026 से एक साल की मातृत्व छुट्टी मांगी थी। लेकिन विलुप्पुरम के प्रिंसिपल डिस्ट्रिक्ट जज ने सरकारी आदेश का हवाला देते हुए उनकी मांग खारिज कर दी और उन्हें 27 अप्रैल 2026 तक ड्यूटी पर लौटने का निर्देश दे दिया। सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि तीसरे बच्चे के लिए मातृत्व अवकाश केवल 12 हफ्तों तक ही सीमित किया जा सकता है।
मामला जब हाई कोर्ट पहुंचा तो यहां तस्वीर पूरी तरह बदल गई। जस्टिस आर. सुरेश कुमार और जस्टिस एन. सेंथिल कुमार की बेंच ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए सख्त टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि गर्भावस्था की प्रकृति हर बार समान होती है और इसमें किसी तरह का भेदभाव न केवल अनुचित है, बल्कि महिला के मूल अधिकारों के खिलाफ भी है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार अपनी कार्यकारी शक्तियों का इस्तेमाल ऐसे नियम बनाने में नहीं कर सकती, जो मानवीय अधिकारों और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के खिलाफ हों। साथ ही अदालत ने सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि जो शासन खुद को महिला अधिकारों का समर्थक बताता है, उसके फैसलों में ऐसा विरोधाभास स्वीकार्य नहीं है।
अपने आदेश में हाई कोर्ट ने जिला न्यायपालिका को निर्देश दिया है कि वे पुराने सरकारी नियमों में उलझे बिना शायी निशा की अर्जी पर दोबारा विचार करें। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा कि उन्हें पहली और दूसरी गर्भावस्था की तरह ही तीसरी बार भी पूर्ण मातृत्व अवकाश दिया जाए और यह पूरी प्रक्रिया एक सप्ताह के भीतर पूरी की जाए।
इस फैसले के बाद अब यह साफ हो गया है कि मातृत्व अधिकारों को सीमित करने की कोशिशें अदालत की कसौटी पर टिक नहीं पाएंगी, और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायपालिका सख्त रुख अपनाने को तैयार है।












