तमिलनाडु में अब हर सरकारी कार्यक्रम में गूंजेगा ‘तमिल थाई वाजथु’! CM विजय के प्रस्ताव पर सियासी हलचल, जानिए क्या बदलेगा?

तमिलनाडु: तमिलनाडु में सरकारी कार्यक्रमों को लेकर एक बड़ा बदलाव चर्चा में है। राज्य में आयोजित होने वाले सरकारी कार्यक्रमों में ‘तमिल थाई वाजथु’ का गायन अनिवार्य करने की तैयारी है। मुख्यमंत्री विजय ने विधानसभा में इससे जुड़ा प्रस्ताव पेश किया है, जिसे लेकर सियासी तस्वीर भी दिलचस्प हो गई है। खास बात यह है कि प्रस्ताव को DMK और AIADMK का भी समर्थन मिला है।

प्रस्ताव पेश करते हुए मुख्यमंत्री विजय ने कहा कि उनकी सरकार और उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (TVK) तमिलनाडु के भाषायी और सांस्कृतिक अधिकारों से किसी भी तरह का समझौता नहीं करेगी। उन्होंने सभी दलों के विधायकों से राजनीतिक मतभेदों को अलग रखते हुए प्रस्ताव का समर्थन करने की अपील की।

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प्रस्ताव पेश करते समय भावुक हुए मुख्यमंत्री विजय

विधानसभा में प्रस्ताव रखते हुए मुख्यमंत्री विजय भावुक नजर आए। उन्होंने तमिल भाषा को राज्य की पहचान और गौरव से जोड़ते हुए कहा कि तमिल सिर्फ एक भाषा नहीं है, बल्कि लोगों की भावना, गर्व और शक्ति का प्रतीक है।

उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में जब भी तमिल भाषा की बात होती है, लोग एकजुट होकर उसके सम्मान के लिए खड़े होते हैं। ऐसे में राज्य गीत ‘तमिल थाई वाजथु’ को सरकारी कार्यक्रमों में उचित सम्मान मिलना चाहिए।

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मुख्यमंत्री ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे प्रस्ताव का समर्थन करें, ताकि ‘तमिल थाई वाजथु’ की गूंज पूरे तमिलनाडु में सुनाई दे।

DMK और AIADMK ने भी दिया समर्थन

मुख्यमंत्री विजय के इस प्रस्ताव को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि DMK और AIADMK ने भी इसका समर्थन किया है।

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प्रस्ताव के मुताबिक, तमिलनाडु में आयोजित होने वाले सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत ‘तमिल थाई वाजथु’ के गायन से की जाएगी।

सरकार ने इस प्रस्ताव को केंद्र के उस प्रस्ताव की तर्ज पर पेश किया है, जिसमें सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान से पहले ‘वंदे मातरम्’ गाने या बजाने की बात कही गई है।

मुख्यमंत्री विजय का तर्क है कि अगर सरकारी कार्यक्रमों में ‘वंदे मातरम्’ को स्थान दिया जा सकता है, तो राज्य के गीत को भी सम्मान दिया जाना चाहिए।

क्या कहा गया है मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव में?

प्रस्ताव में कहा गया है कि ‘तमिल थाई वाजथु’ तमिल भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। तमिल को दुनिया की सबसे पुरानी शास्त्रीय भाषाओं में से एक बताया गया है, जबकि तमिल सभ्यता को भी प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।

प्रस्ताव में तमिल थाई वाजथु को लेकर पुराने सरकारी फैसलों का भी उल्लेख किया गया है।

इसके अनुसार, 23 नवंबर 1970 को तमिलनाडु सरकार ने सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत में ‘तमिल थाई वाजथु’ के गायन को अनिवार्य करने का आदेश जारी किया था। इसके बाद 12 दिसंबर 2021 को इसे राज्य गीत का दर्जा दिया गया और सरकारी कार्यक्रमों तथा संस्थानों में इसके गायन को अनिवार्य किया गया।

1891 में लिखी गई थी ‘तमिल थाई वाजथु’

‘तमिल थाई वाजथु’ कोई नया गीत नहीं है। यह मनोन्मनीयम सुंदरनार द्वारा वर्ष 1891 में लिखे गए नाटक ‘मनोन्मनीयम’ का हिस्सा है।

यह गीत ‘मदर तमिल’ यानी तमिल भाषा की देवी की स्तुति के रूप में लिखा गया था। समय के साथ यह तमिल भाषा, संस्कृति और पहचान से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया।

अब आगे क्या?

मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव के बाद तमिलनाडु में सरकारी कार्यक्रमों में ‘तमिल थाई वाजथु’ की भूमिका और मजबूत होने की उम्मीद है। राजनीतिक दलों के समर्थन के बीच अब इस प्रस्ताव को लेकर आगे की विधानसभा प्रक्रिया पर नजर रहेगी।

अगर प्रस्ताव लागू होता है, तो आने वाले समय में तमिलनाडु के सरकारी कार्यक्रमों की शुरुआत में ‘तमिल थाई वाजथु’ की गूंज अनिवार्य रूप से सुनाई दे सकती है।

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