SC के इस फैसले से CG सहित खनिज उत्‍पादक राज्‍यों की हुई बल्ले-बल्ले : मिलेगी 19 साल की बकाया रायल्‍टी, होगा करोड़ों का फायदा

रायपुर। देश की शीर्ष अदालत ने बुधवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए खनिज उत्‍पादक राज्‍यों को कुछ शर्तों के साथ 2005 से रायल्‍टी वसूलने की छूट दे दी है। कोर्ट के इस आदेश से छत्‍तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड जैसे बड़े खनिज उत्‍पादक राज्‍यों के खजाने में करोड़ों रुपये आएंगे। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 8:1 के बहुमत से यह फैसला सुनाया है।

जानकारी के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को 1 अप्रैल, 2005 से केंद्र और खनन कंपनियों से खनिज पर रॉयल्टी पर पिछले बकाये की वसूली करने की अनुमति दी है। बता दें कि इससे पहले शीर्ष अदालत ने 25 जुलाई को अपने एक फैसले में खनिज उत्‍पादक राज्‍यों को रायल्‍टी वसूलने का अधिकार दिया था। जिसके खिलाफ अपील की गई थी, जिसमें कोर्ट से आग्रह किया गया था कि बीते वर्षों की बजाय इसे मौजूदा समय से इसे लागू किया जाए। लेकिन कोर्ट ने इस याचिका को खारिज कर दिया।

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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 9 न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कुछ शर्तों के साथ बकाया वसूली की छूट दी है। अपने फैसले में कोर्ट ने कहा कि 25 जुलाई के फैसले के भावी प्रभाव संबंधी तर्क को खारिज किया जाता है। पीठ में न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय, न्यायमूर्ति अभय एस ओका, न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला, न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा, न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां, न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह भी शामिल हैं।

पीठ ने अपने आदेश में कहा कि केंद्र और खनन कंपनियों द्वारा खनिज समृद्ध राज्यों को बकाया राशि का भुगतान अगले 12 वर्षों में चरणबद्ध तरीके से किया जा सकता है। पीठ ने राज्यों को बकाया राशि के भुगतान पर किसी भी तरह का जुर्माना नहीं लगाने का निर्देश भी दिया है।

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70,000 करोड़ रुपये का पड़ेगा भार – केंद्र सरकार

सुनवाई के दौरान केंद्र ने 1989 से खदानों और खनिजों पर लगाई गई रॉयल्टी की वापसी की राज्यों की मांग का विरोध करते हुए कहा कि इससे नागरिकों पर असर पड़ेगा और शुरुआती अनुमान के अनुसार सार्वजनिक उपक्रमों को अपने खजाने से 70,000 करोड़ रुपये खाली करने पड़ेंगे। जिसपर सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि इस फैसले पर पीठ के 8 न्यायाधीशों द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे, जिन्होंने 25 जुलाई के फैसले पर बहुमत से फैसला सुनाया था, जिसमें राज्य को खनिज अधिकारों पर कर लगाने का अधिकार दिया गया था। उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति नागरत्ना बुधवार के फैसले पर हस्ताक्षर नहीं करेंगी, क्योंकि उन्होंने 25 जुलाई के फैसले में असहमति जताई थी।

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25 जुलाई को 8:1 के बहुमत वाले फैसले में पीठ ने कहा था कि खनिज अधिकारों पर कर लगाने की विधायी शक्ति राज्यों के पास है। इस फैसले ने 1989 के उस फैसले को खारिज कर दिया था, जिसमें कहा गया था कि केवल केंद्र के पास खनिजों और खनिज युक्त भूमि पर रॉयल्टी लगाने का अधिकार है।

इसके बाद विपक्ष शासित कुछ खनिज समृद्ध राज्यों ने 1989 के फैसले के बाद से केंद्र द्वारा लगाई गई रॉयल्टी और खनन कंपनियों से लिए गए करों की वापसी की मांग की। रिफंड के मामले पर 31 जुलाई को सुनवाई हुई और आदेश सुरक्षित रख लिया गया था जिसे अब जारी किया गया।

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