झारखंड हाईकोर्ट ने प्रमोशन के मुद्दे पर कर्मचारी को दे दिया झटका, कहा, सिर्फ कानूनी विभाग में काम करने से नहीं मिलेगा प्रमोशन

झारखंड हाईकोर्ट ने रांची नगर निगम कर्मचारी अरुण कुमार की असिस्टेंट लॉ ऑफिसर पद पर पदोन्नति की मांग वाली अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि कानूनी विभाग में काम करने मात्र से कैडर नहीं बदलता।

रांची। “कानूनी विभाग में काम करने से नहीं बदलता कैडर, इसलिए आप प्रमोशन के हकदार नहीं” झारखंड हाईकोर्ट ने रांची नगर निगम के कर्मचारी अरुण कुमार को बड़ा झटका देते हुए असिस्टेंट लॉ ऑफिसर (Assistant Law Officer) पद पर पदोन्नति की मांग वाली अपील खारिज कर दी है। मुख्य न्यायाधीश एम.एस. सोनक और न्यायमूर्ति राजेश शंकर की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि अरुण कुमार की नियुक्ति कभी लीगल असिस्टेंट के पद पर नहीं हुई थी, इसलिए उन्हें असिस्टेंट लॉ ऑफिसर पद पर पदोन्नति का कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

कानूनी विभाग में काम करने से नहीं बदलता कैडर

हाईकोर्ट की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि महज किसी कर्मचारी द्वारा कानूनी विभाग में काम करने या कुछ दस्तावेजों एवं पत्राचार में उसे लीगल असिस्टेंट कह देने से उसका कैडर नहीं बदल जाता। किसी भी कर्मचारी का कैडर परिवर्तन केवल सक्षम प्राधिकारी के विधिवत लिखित आदेश से ही संभव है।

अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि लीगल असिस्टेंट का पद एक अलग कैडर का पद है और इसके लिए निर्धारित नियमों के तहत सीधी भर्ती की व्यवस्था है। ऐसे में नियमों को दरकिनार कर किसी कर्मचारी को पदोन्नति देना न्यायसंगत नहीं होगा।

1996 में अनुकंपा नियुक्ति से शुरू हुई सेवा

अरुण कुमार की नियुक्ति वर्ष 1996 में रांची नगर निगम में तृतीय श्रेणी के पद (सहायक) पर अनुकंपा आधार पर हुई थी। बाद में उन्हें नगर निगम के लीगल सेक्शन में तैनात किया गया। वर्ष 2006 में उन्होंने एलएलबी की डिग्री प्राप्त की।इसके बाद वर्ष 2010 में नगर निगम में लीगल असिस्टेंट और असिस्टेंट लॉ ऑफिसर के पद सृजित किए गए। वहीं वर्ष 2017 में झारखंड नगरपालिका सेवा कैडर (संशोधन) नियमावली के तहत लीगल कैडर का गठन किया गया, जिसमें लीगल असिस्टेंट को प्रवेश स्तर का पद और असिस्टेंट लॉ ऑफिसर को प्रथम प्रोन्नति पद घोषित किया गया।

विभाग ने भी प्रस्ताव किया था खारिज

अरुण कुमार का दावा था कि वे वर्षों से कानूनी शाखा में कार्यरत हैं, इसलिए उन्हें लीगल असिस्टेंट माना जाना चाहिए और असिस्टेंट लॉ ऑफिसर पद पर पदोन्नति दी जानी चाहिए।हालांकि, नगर निगम द्वारा उनका प्रस्ताव राज्य के नगर विकास एवं आवास विभाग को भेजा गया था, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया कि वे निर्धारित पात्रता शर्तों को पूरा नहीं करते।इसके बाद अरुण कुमार ने हाईकोर्ट की एकल पीठ में याचिका दायर की थी, जिसे 24 फरवरी 2025 को खारिज कर दिया गया था। इसके खिलाफ उन्होंने खंडपीठ में अपील की थी।

अन्य अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित होते

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि यदि अरुण कुमार को लीगल असिस्टेंट मान लिया जाए, तो उन अन्य योग्य अभ्यर्थियों के अधिकार प्रभावित होंगे जो इस पद के लिए सीधी भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से आवेदन कर सकते थे।अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि जब किसी कार्य को करने का एक निर्धारित वैधानिक तरीका हो, तो उसे उसी तरीके से किया जाना चाहिए। अन्य किसी तरीके को स्वीकार नहीं किया जा सकता।खंडपीठ ने अरुण कुमार की अपील को निराधार बताते हुए खारिज कर दिया और एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा।

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