मोबाइल की गिरफ्त में फंस रही नई पीढ़ी! राज्यपाल की बड़ी चेतावनी- ‘पॉपकॉर्न माइंडसेट’ भविष्य के लिए खतरा

दीक्षांत समारोह में राज्यपाल रमेन डेका ने डिजिटल एडिक्शन पर जताई चिंता, 9,194 विद्यार्थियों को मिली डिग्री

 

रायपुर। क्या मोबाइल और सोशल मीडिया की दुनिया नई पीढ़ी की सोचने-समझने की क्षमता को धीरे-धीरे निगल रही है? क्या युवाओं का भविष्य डिजिटल स्क्रीन की चमक में कहीं खोता जा रहा है? इन गंभीर सवालों के बीच छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका ने एक ऐसी चेतावनी दी है, जिसने शिक्षा जगत और युवाओं के बीच नई बहस छेड़ दी है।

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय के चतुर्थ दीक्षांत समारोह में संबोधित करते हुए राज्यपाल रमेन डेका ने कहा कि डिजिटल एडिक्शन आज की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है। यह केवल व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि परिवार और पूरे समाज को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को डिजिटल एडिक्शन और “पॉपकॉर्न मेंटल स्टेटस” से बाहर निकलने की जरूरत है, क्योंकि यह स्थिति केवल कृत्रिम संतुष्टि देती है और व्यक्ति की गहराई से सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर करती है।

राजधानी रायपुर में आयोजित इस समारोह में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहे। कार्यक्रम में मेडिकल, डेंटल, आयुर्वेद, होम्योपैथिक, नर्सिंग, मेडिकल बायोटेक सहित विभिन्न संकायों के कुल 9 हजार 194 विद्यार्थियों को स्नातक, स्नातकोत्तर और सुपर स्पेशियलिटी की उपाधियां प्रदान की गईं। साथ ही विभिन्न विषयों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को स्वर्ण पदक देकर सम्मानित किया गया।

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राज्यपाल ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ प्रयास करे तो मात्र 30 दिनों में डिजिटल एडिक्शन से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को मोबाइल फोन से दूर रखकर खेल-कूद और बाहरी गतिविधियों के लिए प्रेरित करने की अपील की। उन्होंने चिंता जताई कि आज के बच्चे सीमित दायरे में सिमटते जा रहे हैं, जिसका असर उनकी शारीरिक और मानसिक क्षमता पर भी पड़ रहा है।

नवस्नातक चिकित्सकों को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि डॉक्टर का सफेद कोट केवल एक पहचान नहीं, बल्कि विश्वास का प्रतीक होता है। इस पर कभी कोई दाग नहीं लगना चाहिए। उन्होंने कहा कि चिकित्सा क्षेत्र केवल पेशा नहीं, बल्कि मानवता की सेवा का माध्यम है और हर चिकित्सक का पहला दायित्व मरीज का हित होना चाहिए।

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अपने संबोधन में उन्होंने फैमिली फिजिशियन की पुरानी व्यवस्था को याद करते हुए कहा कि आज समाज को फिर से ऐसे डॉक्टरों की जरूरत है जो मरीज और उसके परिवार की परिस्थितियों को समझ सकें। उन्होंने गोल्डन ऑवर की अहमियत बताते हुए कहा कि संकट के समय डॉक्टर का सही और त्वरित निर्णय किसी की जान बचा सकता है।

राज्यपाल ने आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के बढ़ते प्रभाव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि टेलीमेडिसिन और एआई जैसी तकनीकें दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं और चिकित्सा क्षेत्र के भविष्य को नई दिशा दे सकती हैं।

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने अपने संबोधन में कहा कि दीक्षांत समारोह केवल डिग्री प्राप्त करने का अवसर नहीं, बल्कि समाज और मानवता के प्रति नई जिम्मेदारियों को स्वीकार करने का भी क्षण है। उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ को केवल खनिज और कृषि आधारित राज्य के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार के केंद्र के रूप में स्थापित करना सरकार का लक्ष्य है।

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर राज्यपाल ने सभी विद्यार्थियों और नागरिकों से ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान के तहत पौधारोपण करने की अपील भी की। उन्होंने कहा कि प्रकृति, पशु और मानव जीवन के बीच संतुलन बनाए रखना हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

दीक्षांत समारोह में स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल, राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के राष्ट्रीय विशेषज्ञ पैनल के अध्यक्ष डॉ. वेदप्रकाश मिश्रा, विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. पी.के. पात्रा सहित बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि, शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक उपस्थित रहे।

राज्यपाल की डिजिटल एडिक्शन को लेकर दी गई चेतावनी अब केवल एक भाषण नहीं, बल्कि उस बदलती जीवनशैली पर बड़ा सवाल बनकर सामने आई है, जिसके बीच आज की युवा पीढ़ी अपना भविष्य तलाश रही है।

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