झारखंड: बहू को डांटना या अपशब्द कहना 498A के तहत क्रूरता नहीं, झारखंड हाईकोर्ट ने सास को कर दिया बरी, जानिये क्या है पूरा मामला 

Jharkhand: Scolding or using abusive language towards a daughter-in-law does not constitute cruelty under Section 498A; Jharkhand High Court acquits mother-in-law—here are the details of the case.

रांची। झारखंड हाईकोर्ट ने घरेलू विवाद और दहेज प्रताड़ना से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ बहू को डांटना या अपशब्द कहना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता, जब तक उससे जुड़े कानूनी तत्व और ठोस साक्ष्य मौजूद न हों।

 

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सुनवाई के बाद अदालत ने सास की दोषसिद्धि और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा को रद्द करते हुए उसकी आपराधिक अपील स्वीकार कर ली। न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकलपीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि आरोपी सास ने ऐसा कोई व्यवहार किया, जिससे बहू आत्महत्या के लिए मजबूर हुई हो या उसके मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो।

 

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क्या था पूरा मामला?

इस मामले में अभियोजन के अनुसार, 20 जनवरी 2001 को मृतका ने घर की दीवार पर ऊंचाई पर रखा गुड़ के शीरे का बर्तन उतारकर जमीन पर रख दिया था। इसी बात से नाराज होकर उसकी सास ने उसे डांटा और अपशब्द कहे। आरोप है कि इसके बाद बहू ने आंगन में बने मिट्टी के चूल्हे से जलती आग लेकर खुद को आग के हवाले कर दिया। गंभीर रूप से झुलसने के बाद इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। जांच के दौरान पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने की धारा भी जोड़ दी थी।

 

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दहेज प्रताड़ना का कोई आरोप नहीं मिला

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि मामले में दहेज की मांग या दहेज को लेकर प्रताड़ना का कोई आरोप नहीं था। अदालत ने यह भी कहा कि सात वर्ष के वैवाहिक जीवन के दौरान लगातार क्रूरता या उत्पीड़न का कोई विश्वसनीय और ठोस साक्ष्य भी रिकॉर्ड पर उपलब्ध नहीं है। अदालत के अनुसार, केवल एक घरेलू विवाद या डांट-फटकार को कानून की नजर में धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।

 

निचली अदालत के फैसले पर उठाए सवाल

हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया। साथ ही आरोपी का बयान दर्ज करते समय यह स्पष्ट नहीं किया गया कि उसने किस प्रकार की क्रूरता या उत्पीड़न किया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने सास की दोषसिद्धि और तीन वर्ष के कठोर कारावास की सजा रद्द कर दी। चूंकि अपीलकर्ता पहले से जमानत पर थी, इसलिए अदालत ने उसे जमानती बंधपत्रों से भी मुक्त करने का आदेश दिया।

 

महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी

इस फैसले में हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू विवाद और वैवाहिक जीवन में होने वाली सामान्य कहासुनी को स्वतः धारा 498A के तहत ‘क्रूरता’ नहीं माना जा सकता। किसी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए अभियोजन पक्ष को ठोस, विश्वसनीय और कानूनी रूप से पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक है।

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